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Atharvaveda - Mantra 5

Atharvaveda 2/28/5

36 Sukta
5 Mantra
2/28/5
Devata- द्यावापृथिवी, आयुः Rishi- शम्भुः Chhanda- भुरिक्त्रिष्टुप् Suktam- दीर्घायु प्राप्ति सूक्त
Mantra with Swara
इ॒मम॒ग्न आयु॑षे॒ वर्च॑से नय प्रि॒यं रेतो॑ वरुण मित्र राजन्। मा॒तेवा॑स्मा अदिते॒ शर्म॑ यच्छ॒ विश्वे॑ देवा ज॒रद॑ष्टि॒र्यथास॑त् ॥

इ॒मम् । अ॒ग्ने॒ । आयु॑षे । वर्च॑से । न॒य॒ । प्रि॒यम् । रेत॑: । व॒रु॒ण॒ । मि॒त्रऽरा॒ज॒न् । मा॒ताऽइ॑व । अ॒स्मै॒ । अ॒दि॒ते॒ । शर्म॑ । य॒च्छ॒ । विश्वे॑ । दे॒वा॒: । ज॒रत्ऽअ॑ष्टि: । यथा॑ । अस॑त् ॥२८.५॥

Mantra without Swara
इममग्न आयुषे वर्चसे नय प्रियं रेतो वरुण मित्र राजन्। मातेवास्मा अदिते शर्म यच्छ विश्वे देवा जरदष्टिर्यथासत् ॥

इमम् । अग्ने । आयुषे । वर्चसे । नय । प्रियम् । रेत: । वरुण । मित्रऽराजन् । माताऽइव । अस्मै । अदिते । शर्म । यच्छ । विश्वे । देवा: । जरत्ऽअष्टि: । यथा । असत् ॥२८.५॥

Meaning
१. हे (अग्ने) = उन्नति के साधक प्रभो! (वरुण) = सब द्वेष आदि का निवारण करनेवाले! (मित्र) -= प्रमीति [मृत्यु व पाप] से बचानेवाले अथवा सबके प्रति स्नेह करनेवाले (राजन्) = हम सबके जीवन को शासित करनेवाले प्रभो! (इमम्) = इस हमारी सन्तान को आयुषे दीर्घजीवन के लिए, (वर्चसे) = रोगों से संघर्ष करने में समर्थ शक्ति के लिए (प्रियं रेत:) = तृप्ति व कान्ति को देनेवाले[प्री तर्पणे कान्तौ च] रेतस् को-वीर्य को (नय) = प्राप्त कराइए। इस रेतस् को प्राप्त करके यह रोगों को पराजित करता हुआ दीर्घजीवन प्राप्त करे। २. हे (अदिते) = पृथिवी अथवा स्वास्थ्य की अधिष्ठातृदेवते! तू (माता इव) = माता के समान अस्मै इसके लिए (शर्म यच्छ) = कल्याण प्राप्त करा

और (विश्वेदेवा:) = हे सब देवो! आप भी ऐसी कृपा करो (यथा) = जिससे यह (जरदष्टिः) = वृद्धावस्था तक कार्यों में (व्याप्सिवाला) = [जीर्यतोऽपि अष्टि: सर्वव्यापारविषया व्याप्तिर्यस्य-सा०] (असत्) = हो। इसका जीवन अन्त तक बड़ा क्रियाशील बना रहे।
Essence
हम अग्नि, मित्र, वरुण व राजा की कृपा से दीर्घजीवी बनें।
Subject
अग्नि, मित्र, वरुण
Information
प्रस्तुत मन्त्र में प्रभु को अग्नि आदि नामों से स्मरण करना यह सूचित करता है कि दीर्घजीवन के लिए आवश्यक है कि [क] हम क्रियाशील हों [अग्नि, अगि गतौ], [ख] द्वेष से ऊपर उठे [वरुण-वारयति], [ग] सबके लिए स्नेहवाले हों [मित्र, मिद, स्नेहने], [घ] राजन-[राज दीप्तौं] ज्ञान-दीस व व्यवस्थित जीवनवाले हों।

विशेष-सम्पूर्ण सूक्त दीर्घ जीवन के साधनों का उल्लेख कर रहा है। अगले सूक्त का विषय भी यही है, ऋषि'अथर्वा' है-स्थिर चित्तवृत्तिवाला [न थर्वति]। चित्तवृत्ति की स्थिरता दीर्घजीवन के लिए आवश्यक ही है -

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