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Atharvaveda - Mantra 4

Atharvaveda 2/28/4

36 Sukta
5 Mantra
2/28/4
Devata- द्यावापृथिवी, आयुः Rishi- शम्भुः Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- दीर्घायु प्राप्ति सूक्त
Mantra with Swara
द्यौष्ट्वा॑ पि॒ता पृ॑थि॒वी मा॒ता ज॒रामृ॑त्युं कृणुतां संविदा॒ने। यथा॒ जीवा॒ अदि॑तेरु॒पस्थे॑ प्राणापा॒नाभ्यां॑ गुपि॒तः श॒तं हिमाः॑ ॥

द्यौ: । त्वा॒ । पि॒ता । पृ॒थि॒वी । मा॒ता । ज॒राऽमृ॑त्युम् । कृ॒णु॒ता॒म् । सं॒वि॒दा॒ने इति॑ स॒म्ऽवि॒दा॒ने । यथा॑ । जीवा॑: । अदि॑ते: । उ॒प‍स्थे॑ । प्रा॒णा॒पा॒नाभ्या॑म् । गु॒पि॒त: । श॒तम् । हिमा॑: ॥२८.४॥

Mantra without Swara
द्यौष्ट्वा पिता पृथिवी माता जरामृत्युं कृणुतां संविदाने। यथा जीवा अदितेरुपस्थे प्राणापानाभ्यां गुपितः शतं हिमाः ॥

द्यौ: । त्वा । पिता । पृथिवी । माता । जराऽमृत्युम् । कृणुताम् । संविदाने इति सम्ऽविदाने । यथा । जीवा: । अदिते: । उप‍स्थे । प्राणापानाभ्याम् । गुपित: । शतम् । हिमा: ॥२८.४॥

Meaning
१. (त्वा) = तुझे पिता (द्यौः) = पितृस्थानापन्न झुलोक तथा (माता पृथिवी) = मातृस्थानापन्न पृथिवी (संविदाने) = परस्पर ऐकमत्यवाली होकर (जरामृत्यु कृणुताम्) = पूर्ण जरावस्था में ही मृत्युवाला, अर्थात् दीर्घजीवी करें। धुलोक तथा पृथिवीलोक की अनुकूलता तेरे दीर्घायुष्य का कारण हो। शरीर में मस्तिष्क ही झुलोक है तथा शरीर ही पृथिवी है। मस्तिष्क द्युलोक की भाँति ज्ञान से देदीप्यमान हो तथा शरीर पृथिवी की भौति दृढ़ हो। ऐसा होने पर दीर्घजीवन होना सम्भव है। २. तुझे झुलोक व पृथिवीलोक की अनुकूलता प्राप्त हो (यथा) = जिससे कि तू (अदितेः उपस्थे) = इस पृथिवी की गोद में[अदिति-अखण्डन, स्वास्थ्य का न टूटना] स्वास्थ्य की गोद में (प्राणापानाभ्यां गुपित:) = प्राणापान से रक्षित (हुआ) = हुआ (शतं हिमा:) = पूरे सौ वर्ष (जीवा:) जीनेवाला हो।
Essence
हम झुलोक व पृथिवीलोक की अनुकूलता से सौ वर्ष तक जीनेवाले बनें। प्राणापान से रक्षित होकर हम दीर्घजीवी हों।
Subject
द्यलोक व पृथिवीलोक का ऐकमत्य

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