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Atharvaveda - Mantra 1

Atharvaveda 2/28/1

36 Sukta
5 Mantra
2/28/1
Devata- जरिमा, आयुः Rishi- शम्भुः Chhanda- जगती Suktam- दीर्घायु प्राप्ति सूक्त
Mantra with Swara
तुभ्य॑मे॒व ज॑रिमन्वर्धताम॒यम्मेमम॒न्ये मृ॒त्यवो॑ हिंसिषुः श॒तं ये। मा॒तेव॑ पु॒त्रं प्रम॑ना उ॒पस्थे॑ मि॒त्र ए॑नं मि॒त्रिया॑त्पा॒त्वंह॑सः ॥

तुभ्य॑म् । ए॒व । ज॒रि॒म॒न् । व॒र्ध॒ता॒म् । अ॒यम् । मा । इ॒मम् । अ॒न्ये । मृ॒त्यव॑: । हिं॒सि॒षु॒: । श॒तम् । ये । मा॒ताऽइ॑व । पु॒त्रम् । प्रऽम॑ना: । उ॒पऽस्थे॑ । मि॒त्र: । ए॒न॒म् । मि॒त्रिया॑त् । पा॒तु॒ । अंह॑स: ॥२८.१॥

Mantra without Swara
तुभ्यमेव जरिमन्वर्धतामयम्मेममन्ये मृत्यवो हिंसिषुः शतं ये। मातेव पुत्रं प्रमना उपस्थे मित्र एनं मित्रियात्पात्वंहसः ॥

तुभ्यम् । एव । जरिमन् । वर्धताम् । अयम् । मा । इमम् । अन्ये । मृत्यव: । हिंसिषु: । शतम् । ये । माताऽइव । पुत्रम् । प्रऽमना: । उपऽस्थे । मित्र: । एनम् । मित्रियात् । पातु । अंहस: ॥२८.१॥

Meaning
१. (जरिमन्) = [जरैव जरिमा] हे जरे! (अयम्) = यह कुमार (तुभ्यम् एव) = तेरे लिए ही-तेरे आने तक, चिरकाल तक (वर्धताम्) = वृद्धि को प्राप्त होता चले। (इमम्) = इसे (अन्ये) = तुझसे भिन्न (ये) = जो (शतम्) = सैकड़ों (मृत्यवः) = रोगरूप मृत्यु हैं, वे (मा हिंषिषुः) = मत हिंसित करें । यह यौवन में ही रोगाभिभूत होकर जीवन को समाप्त करनेवाला न हो। २. (इव) = जिस प्रकार (प्रमना) = प्रमुदित मनवाली (माता) = माता (पुत्रम्) = पुत्र को (उपस्थे) = अपनी गोद में रक्षित करती है, उसी प्रकार (एनम्) = इस बालक को (मित्र:) = मृत्यु से बचानेवाला यह सूर्य (मित्रियात्) = सूर्य की अत्युष्णता से होनेवाले अंहसः-कष्ट से पातु-बचाए। यह बालक सूर्य की गोद में पले-अधिक-से-अधिक सूर्य के सम्पर्क में रहे, परन्तु सूर्य की अत्युष्णता से होनेवाले कष्टों से बचा रहे। सूर्य की किरणें इसके शरीर पर पड़कर रोगकृमियों को नष्ट करनेवाली हों।
Essence
सूर्य के सम्पर्क में रहकर, रोगों से बचते हुए, हम पूर्णायुष्य को प्राप्त करनेवाले हों।
Subject
सूर्यसम्पर्क व दीर्घजीवन

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