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Atharvaveda - Mantra 3

Atharvaveda 2/27/3

36 Sukta
7 Mantra
2/27/3
Devata- ओषधिः Rishi- कपिञ्जलः Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- शत्रुपराजय सूक्त
Mantra with Swara
इन्द्रो॑ ह चक्रे त्वा बा॒हावसु॑रेभ्य॒ स्तरी॑तवे। प्राशं॒ प्रति॑प्राशो जह्यर॒सान्कृ॑ण्वोषधे ॥

इन्द्र॑: । ह॒ । च॒क्रे॒ । त्वा॒ । बा॒हौ । असु॑रेभ्य: । स्तरी॑तवे । प्राश॑म् । प्रति॑ऽप्राश: । ज॒हि॒ । अ॒र॒सान् । कृ॒णु॒ । ओ॒ष॒धे॒ ॥२७.३॥

Mantra without Swara
इन्द्रो ह चक्रे त्वा बाहावसुरेभ्य स्तरीतवे। प्राशं प्रतिप्राशो जह्यरसान्कृण्वोषधे ॥

इन्द्र: । ह । चक्रे । त्वा । बाहौ । असुरेभ्य: । स्तरीतवे । प्राशम् । प्रतिऽप्राश: । जहि । अरसान् । कृणु । ओषधे ॥२७.३॥

Meaning
१. यह पाटा ओषधि भग्न-सन्धानकरी' है, अत: (इन्द्रः) = सेनापति ने (ह) = निश्चय से ही पाटा ओषधे! (त्वा) = तुझे (असरेभ्यः) = असुरों से (तरीतवे) = पार पाने के लिए (बाहौ चक्रे) = अपनी भुजाओं पर धारण किया। संग्राम में विदारणों का भय बना ही रहता है। यह पाटा ओषधि इन विदारणों का सर्वोतम उपचार है, अत: सेनापति इसे सदा अपने समीप रखता है, मानो इसे बाहु पर ही धारण किये रहता है। २. हे (ओषधे) = ओषधे! तू (प्राशम्) = पथ्यसेवी के (प्रतिप्राश:) = विरोधी होकर खा जानेवाले रोगों को (जहि) = नष्ट कर। इन रोगकृमियों को (अरसान् कृणु) = शुष्क कर दे।
Essence
पाटा ओषधि भग्नसन्धानकरी है, अतः संग्राम में घावों के उपचार में अत्यन्त उपयुक्त है, इसी से सेनापति इसे सदा समीप रखता है।
Subject
इन्द्र द्वारा पाटा का धारण

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