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Atharvaveda - Mantra 1

Atharvaveda 2/27/1

36 Sukta
7 Mantra
2/27/1
Devata- ओषधिः Rishi- कपिञ्जलः Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- शत्रुपराजय सूक्त
Mantra with Swara
नेच्छत्रुः॒ प्राशं॑ जयाति॒ सह॑मानाभि॒भूर॑सि। प्राशं॒ प्रति॑प्राशो जह्यर॒सान्कृ॑ण्वोषधे ॥

न । इत् । शत्रु॑: । प्राश॑म् । ज॒या॒ति॒ । सह॑माना । अ॒भि॒ऽभू: । अ॒सि॒ । प्राश॑म् । प्रति॑ऽप्राश: । ज॒हि॒ । अ॒र॒सान् । कृ॒णु॒ । ओ॒ष॒धे॒ ॥२७.१॥

Mantra without Swara
नेच्छत्रुः प्राशं जयाति सहमानाभिभूरसि। प्राशं प्रतिप्राशो जह्यरसान्कृण्वोषधे ॥

न । इत् । शत्रु: । प्राशम् । जयाति । सहमाना । अभिऽभू: । असि । प्राशम् । प्रतिऽप्राश: । जहि । अरसान् । कृणु । ओषधे ॥२७.१॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (शत्रुः) = रोगकृमि के रूप में हमारा शातन करनेवाला यह (शत्रु प्राशम्) = प्रकृष्ट भोजनवाले पथ्यसेवी पुरुष को (न इत् जयाति) = निश्चय ही जीत नहीं पाता। २. हे पाटा नामक औषधे! तू भी (सहमाना) = शत्रुओं का मषर्ण करनेवाली और (अभिभूः असि) = रोगों को दबा लेनेवाली है। हे (ओषधे) = [दोषं धयति पिबति-आद्यक्षर लोप] दोष को पी जानेवाली ओषधे! तू (प्राशं) = प्रति (प्राश:) = पथ्य-सेवी के, शत्रु बनकर उसे खा जानेवाले, रोगों को (जहि) = नष्ट कर दे। इन सब रोग व रोगकृमियों को (अरसान् कृणु) = तू शुष्क कर दे। इनकी शक्ति को तू समाप्त कर दे।
Essence
हम 'प्राश'-उत्कृष्ट पथ्य भोजनवाले बनें। ओषधि का उचित प्रयोग करें। इसप्रकार हमारे रोगरूप शत्रु शुष्क होकर समाप्त हो जाएंगे।

 
Subject
'प्राश' से रोगों का नाश