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Atharvaveda - Mantra 1

Atharvaveda 2/24/1

36 Sukta
8 Mantra
2/24/1
Devata- आयुः Rishi- ब्रह्मा Chhanda- वैराजपरा पञ्चपदा पथ्यापङ्क्तिः, भुरिक्पुरउष्णिक् Suktam- शत्रुनाशन सूक्त
Mantra with Swara
शेर॑भक॒ शेर॑भ॒ पुन॑र्वो यन्तु या॒तवः॒ पुन॑र्हे॒तिः कि॑मीदिनः। यस्य॒ स्थ तम॑त्त॒ यो वः॒ प्राहै॒त्तम॑त्त॒ स्वा मां॒सान्य॑त्त ॥

शेर॑भक । शेर॑भ । पुन॑: । व॒: । य॒न्तु॒ । या॒तव॑: । पुन॑: । हे॒ति: । कि॒मी॒दि॒न॒: । यस्य॑ । स्थ । तम् । अ॒त्त॒ । य: । व॒: । प्र॒ऽअहै॑त् । तम् । अ॒त्त॒ । स्वा । मां॒सानि॑ । अ॒त्त॒ ॥२४.१॥

Mantra without Swara
शेरभक शेरभ पुनर्वो यन्तु यातवः पुनर्हेतिः किमीदिनः। यस्य स्थ तमत्त यो वः प्राहैत्तमत्त स्वा मांसान्यत्त ॥

शेरभक । शेरभ । पुन: । व: । यन्तु । यातव: । पुन: । हेति: । किमीदिन: । यस्य । स्थ । तम् । अत्त । य: । व: । प्रऽअहैत् । तम् । अत्त । स्वा । मांसानि । अत्त ॥२४.१॥

Meaning
१. (शेरभक) = हे वध करनेवाले ['शसु वधे'धातु से 'ड' प्रत्यय करके 'श: ' वध, तत्र रभते उत्सुकी भवति इति शेरभः शेरभ एव शेरभक:], (शेरभ) = शरभवत् सबके वधक, हे (किमीदिन:)  [किम् इदानीम् इति चरते-नि०] लुटेरो! (य:) = तुम्हारे (यातव:) = भेजे हुए राक्षसी वृत्तिवाले लोग (पुन:) = फिर लौटकर (वः यन्तु) = तुम्हें ही प्राप्त हों, (हेति:) = तुम्हारे अस्त्र-शस्त्र (पुनः) = फिर तुम्हें ही प्रास हों। २. (यातब:) =  हे राक्षसी वृत्ति के लोगो! (यस्य स्थ) = तुम जिसके हो (तम् अत्त) = उसे ही खानेवाले होओ। (य:) = जो (व:) = तुम्हें (प्राहैत्) = भेजता है तुम (तम् अत्त) = उसे ही खाओ तथा (स्वा मांसानि अत्त) = अपने मांस को ही खानेवाले बनो।
Essence
हममें से दूसरों के घातपात की वृत्ति नष्ट हो जाए। यह अशुभ भाव हमारे ही सन्ताप का कारण बने और हम प्रायश्चित्त करके इससे दूर होने का संकल्प करें।
Subject
घातपात की उत्सुकता का दूर होना

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