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Atharvaveda - Mantra 4

Atharvaveda 2/19/4

36 Sukta
5 Mantra
2/19/4
Devata- अग्निः Rishi- अथर्वा Chhanda- एकावसानानिचृद्विषमात्रिपाद्गायत्री Suktam- शत्रुनाशन सूक्त
Mantra with Swara
अग्ने॒ यत्ते॑ शो॒चिस्तेन॒ तं प्रति॑ शोच॒ यो॑३ ऽस्मान्द्वेष्टि॒ यं व॒यं द्वि॒ष्मः ॥

अग्ने॑ । यत् । ते॒ । शो॒चि: । तेन॑ । तम् । प्रति॑ । शो॒च॒ । य: । अ॒स्मान् । द्वेष्टि॑ । यम् । व॒यम् । द्वि॒ष्म: ॥१९.४॥

Mantra without Swara
अग्ने यत्ते शोचिस्तेन तं प्रति शोच यो३ ऽस्मान्द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः ॥

अग्ने । यत् । ते । शोचि: । तेन । तम् । प्रति । शोच । य: । अस्मान् । द्वेष्टि । यम् । वयम् । द्विष्म: ॥१९.४॥

Meaning
१. हे (अग्रे) = ज्ञानदीप्त प्रभो ! (यत्) = जो (ते) = आपकी (शोचि:) = ज्ञान-ज्वाला की दीप्ति है, (तेन) = उससे (तं प्रति शोच) = उसके जीवन में दीति कीजिए (यः) = जो (अस्मान्) = हम सबके (प्रति द्वेष्टि) = द्वेष करता है और परिणामतः वयम्-हम भी यम्-जिससे द्विष्मः-प्रीति नहीं कर पाते। २. इन द्वेष स्वभाववाले व्यक्तियों के हदय में ज्ञान-ज्वाला से दीति उत्पन्न करके इनके द्वेषभाव को समाप्त करने का प्रयत्न करना चाहिए। अज्ञान द्वेष का कारण बनता है। ज्ञान की दीप्ति होते ही द्वेष की व्यर्थता स्पष्ट हो जाती है। मूर्ख ही द्वेष कर सकता है, ज्ञानी नहीं।
Essence
ज्ञान की दीसि के द्वारा हम हदयों को शुद्ध करके द्वेष-भावना का विनाश करें।
Subject
शोचिः [ज्वाला की दीप्ति]

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