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Atharvaveda - Mantra 3

Atharvaveda 2/19/3

36 Sukta
5 Mantra
2/19/3
Devata- अग्निः Rishi- अथर्वा Chhanda- एकावसानानिचृद्विषमात्रिपाद्गायत्री Suktam- शत्रुनाशन सूक्त
Mantra with Swara
अग्ने॒ यत्ते॒ऽर्चिस्तेन॒ तं प्रत्य॑र्च॒ यो॑३ ऽस्मान्द्वेष्टि॒ यं व॒यं द्वि॒ष्मः ॥

अग्ने॑ । यत् । ते॒ । अ॒र्चि: । तेन॑ । तम् । प्रति॑ । अ॒र्च॒ । य: । अ॒स्मान् । द्वेष्टि॑ । यम् । व॒यम् । द्वि॒ष्म: ॥१९.३॥

Mantra without Swara
अग्ने यत्तेऽर्चिस्तेन तं प्रत्यर्च यो३ ऽस्मान्द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः ॥

अग्ने । यत् । ते । अर्चि: । तेन । तम् । प्रति । अर्च । य: । अस्मान् । द्वेष्टि । यम् । वयम् । द्विष्म: ॥१९.३॥

Meaning
१. हे (अग्ने) = ज्ञान की ज्योति से दीस प्रभो! (यत्) = जो (ते) = आपकी (अर्चि:) = ज्ञान की ज्वाला है, (तेन) = उससे (तं प्रति अर्च)) = उसके अन्दर उस ज्वाला को जगाइए, जिसमें उसका सब द्वेष दग्ध हो जाए। यह ज्वाला उसमें जगाइए (य:) = जो (अस्मान् द्वेष्टि) = हमसे द्वेष करता है और परिणामत: (यम्) = जिससे (वयम्) = हम (द्विष्मः) = प्रेम नहीं कर पाते [द्विष अप्रीती] । २. गतमन्त्र में वर्णित हरण के लिए आवश्यक है कि उस द्वेष करनेवाले के हृदय में ज्ञान की ज्वाला दीप्त की जाए। द्वेष इसी ज्वाला में भस्मीभूत होगा। अज्ञान में ही द्वेष पनपता है। ज्ञान वह अग्नि है, जिसमें सब अशुभ वासनाएँ दग्ध हो जाती हैं।
Essence
ज्ञान की ज्वाला में द्वेष की भावनाएँ दग्ध हो जाएँ। अग्नि हमारे हृदय में ज्ञानाग्नि को दीप्त करे और वहाँ यह ज्ञानज्वाला सब वासनामल को भस्म कर दे।
Subject
अर्चि-ज्ञानज्वाला

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