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Atharvaveda - Mantra 1

Atharvaveda 2/19/1

36 Sukta
5 Mantra
2/19/1
Devata- अग्निः Rishi- अथर्वा Chhanda- एकावसानानिचृद्विषमात्रिपाद्गायत्री Suktam- शत्रुनाशन सूक्त
Mantra with Swara
अग्ने॒ यत्ते॒ तप॒स्तेन॒ तं प्रति॑ तप॒ यो॑३ ऽस्मान्द्वेष्टि॒ यं व॒यं द्वि॒ष्मः ॥

अग्ने॑ । यत् । ते॒ । तप॑: । तेन॑ । तम् । प्रति॑ । त॒प॒ । य: । अ॒स्मान् । द्वेष्टि॑ । यम् । व॒यम् । द्वि॒ष्म: ॥१९.१॥

Mantra without Swara
अग्ने यत्ते तपस्तेन तं प्रति तप यो३ ऽस्मान्द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः ॥

अग्ने । यत् । ते । तप: । तेन । तम् । प्रति । तप । य: । अस्मान् । द्वेष्टि । यम् । वयम् । द्विष्म: ॥१९.१॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. हे (अग्ने) = [अगि गतौ] सब दोषों को गति के द्वारा भस्म करनेवाले प्रभो! (यत् ते तपः) = जो आपका तप है, (तेन)  = उसके द्वारा (तं प्रति तप) = उसे तपानेवाले होओ, (यः) = जो (अस्मान देष्टि) = हमारे प्रति द्वेष करता है और परिणामत: (यं वयं द्विष्मः) = जिससे हम भी प्रीति नहीं कर पाते। २. यहाँ मन्त्र के उत्तरार्ध में 'य:' एक वचन है और 'अस्मान्' बहुवचन है। इससे स्पष्ट है कि कोई एक व्यक्ति सारी समाज का विरोध करता है, सारी समाज की उन्नति में विघातक बनता है। यदि वह साम [शान्ति से समझाना] आदि उपायों से अपनी समाज-विरोधी गतिविधियों से नहीं रुकता, तो अन्ततः समाज भी उसे अवाञ्छनीय समझने लगती है और अग्नि से-राष्ट्र सञ्चालक से प्रार्थना करती है कि अब इसे आप ही दण्ड-सन्तप्त कीजिए। ३. समाज प्रभु से भी यही आराधना करती है कि आपमें ही सम्पूर्ण तप है-उस तप से सन्तप्त करके इसके जीवन को भी द्वेष के मल से रहित कीजिए। इसे भी कुछ ऐसी प्रेरणा प्राप्त हो कि यह अपना दोष देखे और उसके लिए उसमें पश्चात्ताप की भावना उत्पन्न हो। यह पश्चात्ताप उसे द्वेष से ऊपर उठानेवाला हो।
Essence
अग्नि का तप समाज-विद्वेषी को तप्त करके उसे द्वेष के मल से रहित करे।
Subject
अनि का तप
Information
'अग्नि' शरीर में वाणी है। इस वाणी का तप द्वेष की भावनाओं को दूर करनेवाला हो। प्रचारक वाणी से इसप्रकार के उपदेश करे कि उस द्वेषी का मन पश्चात्ताप की भावना से सन्तप्त हो उठे और वह द्वेष से ऊपर उठने का निश्चय कर ले।