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Atharvaveda - Mantra 1

Atharvaveda 2/17/1

36 Sukta
7 Mantra
2/17/1
Devata- प्राणः, अपानः, आयुः Rishi- ब्रह्मा Chhanda- एदपदासुरीत्रिष्टुप् Suktam- बल प्राप्ति सूक्त
Mantra with Swara
ओजो॒ऽस्योजो॑ मे दाः॒ स्वाहा॑ ॥

ओज॑: । अ॒सि॒ । ओज॑: । मे॒ । दा॒: । स्वाहा॑ ॥१७.१॥

Mantra without Swara
ओजोऽस्योजो मे दाः स्वाहा ॥

ओज: । असि । ओज: । मे । दा: । स्वाहा ॥१७.१॥

Meaning
१. गतसूक्त के अन्तिम मन्त्र में प्रभु को 'विश्वम्भर' कहा था-सब शक्तियों का भरण करनेवाला। उस विश्वम्भर से प्रार्थना करते हैं कि-(ओजः असि) = आप ओज हो, (मे) = मेरे लिए भी (ओज: दा:) = इस ओज को दीजिए। (स्वाहा) = [सु+आइ] मेरी वाणी सदा यही शुभ प्रार्थना करनेवाली हो। २. 'ओजस्'वह शक्ति है जो सब प्रकार की वृद्धि का कारण बनती है [ओज to increase]| इस ओज को प्राप्त करके मैं वृद्धि के मार्ग पर आगे बढ़ें।
Essence
प्रभु ओज के पुञ्ज हैं। मैं भी प्रभु को इस रूप में स्मरण करता हुआ ओजस्वी बनें।
Subject
ओजस्

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