Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Atharvaveda - Mantra 6

Atharvaveda 2/15/6

36 Sukta
6 Mantra
2/15/6
Devata- प्राणः, अपानः, आयुः Rishi- ब्रह्मा Chhanda- त्रिपाद्गायत्री Suktam- अभय प्राप्ति सूक्त
Mantra with Swara
यथा॑ भू॒तं च॒ भव्यं॑ च॒ न बि॑भी॒तो न रिष्य॑तः। ए॒वा मे॑ प्राण॒ मा बि॑भेः ॥

यथा॑ । भू॒तम् । च॒ । भव्य॑म् । च॒ । न । बि॒भी॒त: । न । रिष्य॑त: । ए॒व । मे॒ । प्रा॒ण॒ । मा । बि॒भे॒: ॥१५.६॥

Mantra without Swara
यथा भूतं च भव्यं च न बिभीतो न रिष्यतः। एवा मे प्राण मा बिभेः ॥

यथा । भूतम् । च । भव्यम् । च । न । बिभीत: । न । रिष्यत: । एव । मे । प्राण । मा । बिभे: ॥१५.६॥

Meaning
१. (यथा) = जैसे (भूतं च भव्यं च) = भूत और भविष्यत् (न बिभीत:) = न डरते हैं और (न रिष्यत:) = न हिंसित होते हैं, (एव) = इसीप्रकार (मे प्राण) = हे मेरे प्राण! तू भी (मा बिभे:) = भयभीत न हो। २. 'भूत' समास हो चुका है, 'भविष्यत्' अभी है ही नहीं, अत: इन दोनों में भय का निवास न होकर, इसका सदा वर्तमान में ही निवास होता है। वस्तुत: जो व्यक्ति भूत का विचार करके उससे शिक्षा ग्रहण करता हुआ भविष्यत् का कार्य-क्रम निर्धारित करता है, उसे वर्तमान में कभी भयभीत नहीं होना पड़ता। 'भूत' से सीखना, 'भविष्य' के लिए दृढ़ संकल्प करना ही निर्भयता व अहिंस्यता का रहस्य है। ३. इसप्रकार हम अपने वर्तमान को भूत और भविष्य से जोड़कर चलेंगे तो भय से बचे रहेंगे।
Essence
हम भूत से भविष्यत् का निर्माण करनेवाले बनें। भूत से शिक्षा लेकर वर्तमान में सन्मार्ग का आक्रमण करते हुए भविष्य को उज्ज्वल बनाएँ।
Subject
भूत और भव्य
Special
विशेष-सारा सूक्त बड़ी सुन्दरता से निर्भयता व अहिंस्यता के साधनों का उपदेश करके उत्तम जीवन का मार्ग दिखला रहा है। अगले सूक्त में भी इस उत्तम जीवन का चित्रण है -

We are thankful to https://vedicscriptures.in for providing us a substantial amount of data for this section of the Vedas.