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Atharvaveda - Mantra 4

Atharvaveda 2/14/4

36 Sukta
6 Mantra
2/14/4
Devata- शालाग्निः Rishi- चातनः Chhanda- उपरिष्टाद्विराड्बृहती Suktam- दस्युनाशन सूक्त
Mantra with Swara
भू॑त॒पति॒र्निर॑ज॒त्विन्द्र॑श्चे॒तः स॒दान्वाः॑। गृ॒हस्य॑ बु॒ध्न आसी॑नास्ता॒ इन्द्रो॒ वज्रे॒णाधि॑ तिष्ठतु ॥

भू॒त॒ऽपति॑: । नि: । अ॒ज॒तु॒ । इन्द्र॑: । च॒ । इ॒त: । स॒दान्वा॑: । गृ॒हस्य॑ । बु॒ध्ने । आसी॑ना: । ता: । इन्द्र॑: । वज्रे॑ण । अधि॑ । ति॒ष्ठतु॒ ॥१४.४॥

Mantra without Swara
भूतपतिर्निरजत्विन्द्रश्चेतः सदान्वाः। गृहस्य बुध्न आसीनास्ता इन्द्रो वज्रेणाधि तिष्ठतु ॥

भूतऽपति: । नि: । अजतु । इन्द्र: । च । इत: । सदान्वा: । गृहस्य । बुध्ने । आसीना: । ता: । इन्द्र: । वज्रेण । अधि । तिष्ठतु ॥१४.४॥

Meaning
१.(भूतपति:) = सब प्राणियों का रक्षक (च) = वह (इन्द्र:) = [इरा दृणाति] भूमि का, भौतिक भोगों का विदारक देव इन्द्र (सदान्वः) = [सदा नोनूयमाना आक्रोशकारिणी:] सदा चिल्लाने व अपशब्द बोलनेवाली इन स्त्रियों को (इत:) = यहाँ-मेरे घर से (निरजतु) = बाहर क्षिप्त करे। मेरे घर से इनका सम्बन्ध न हो। २. (गृहस्य) = घर के (बुध्ने) = मूल में (आसीना:) = बैठी हुई (ता:) = उनको (इन्द्र:) = जितेन्द्रिय पुरुष (वज्रेण) = क्रियाशीलता रूप वज्र से (अधितिष्ठतु) = अधिष्ठित करे। घर का आधार गृहिणियाँ ही होती हैं, इसी से उन्हें 'घर के आधार में बैठी हुई' कहा गया है। इनमें दोष दो कारणों से उत्पन्न होते हैं-[क] एक तो पुरुष की अजितेन्द्रिता से और [ख] दुसरे अकर्मण्यता से। 'इन्द्र' शब्द प्रथम कारण का निराकरण करता है और वजेण' दूसरे कारण का। पुरुष जितेन्द्रिय हो तथा स्त्रियों को अकर्मण्य न होने दे तो स्त्रियों व्यर्थ की बातों से ऊपर उठ जाती हैं।
Essence
पुरुष जितेन्द्रिय बनकर स्त्रियों को कार्य में रत रखने से उनके वाग्दोषों को दूर कर पाता है।
Subject
वाग्दोष का दूरीकरण

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