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Atharvaveda - Mantra 4

Atharvaveda 2/13/4

36 Sukta
5 Mantra
2/13/4
Devata- आयुः Rishi- अथर्वा Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- दीर्घायु प्राप्ति सूक्त
Mantra with Swara
एह्यश्मा॑न॒मा ति॒ष्ठाश्मा॑ भवतु ते त॒नूः। कृ॒ण्वन्तु॒ विश्वे॑ दे॒वा आयु॑ष्टे श॒रदः॑ श॒तम् ॥

आ । इ॒हि॒ । अश्मा॑नम् । आ । ति॒ष्ठ॒ । अश्मा॑ । भ॒व॒तु॒ । ते॒ । त॒नू: । कृ॒ण्वन्तु॑ । विश्वे॑ । दे॒वा: । आयु॑: । ते॒ । श॒रद॑: । श॒तम् ॥१३.४॥

Mantra without Swara
एह्यश्मानमा तिष्ठाश्मा भवतु ते तनूः। कृण्वन्तु विश्वे देवा आयुष्टे शरदः शतम् ॥

आ । इहि । अश्मानम् । आ । तिष्ठ । अश्मा । भवतु । ते । तनू: । कृण्वन्तु । विश्वे । देवा: । आयु: । ते । शरद: । शतम् ॥१३.४॥

Meaning
१. आचार्य ब्रह्मचारी से कहते हैं-(एहि) = आओ, (अश्मानम् आतिष्ठि) = इस पाषाण पर स्थित होओ। (ते तनू:) = तेरा शरीर (अश्मा भवतु) = पाषाण-जैसा ही दृढ़ बन जाए। इस पाषाण से प्ररेणा लेकर अपने शरीर को इसीप्रकार दृढ़ बनाने का तेरा संकल्प हो। २. (विश्वेदेवा:) = सब देव (ते आयुः) = तेरे जीवन को (शतं शरदः) = सौ शरद् ऋतुओं तक चलनेवाला (कृण्वन्तु) = करें। सूर्य आदि देवों के सम्पर्क में रहता हुआ तू सदा स्वस्थ हो तथा दिव्य गुण तेरे मन को सब आयुष्य विघातक भावों से रहित करनेवाले हों।
Essence
दीर्घ जीवन के लिए आवश्यक है कि हम [क] शरीर को दृढ़ बनाने की भावनावाले हों। [ख] सूर्यादि देवों के सम्पर्क में जीवन बिताएँ, [ग]दिव्य गुणों को मन में स्थान दें।
Subject
पाषाणवत् दृढ़ शरीर

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