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Atharvaveda - Mantra 5

Atharvaveda 2/12/5

36 Sukta
8 Mantra
2/12/5
Devata- पितरः सौम्यः Rishi- भरद्वाजः Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- शत्रुनाशन सूक्त
Mantra with Swara
द्यावा॑पृथिवी॒ अनु॒ मा दी॑धीथां॒ विश्वे॑ देवासो॒ अनु॒ मा र॑भध्वम्। अङ्गि॑रसः॒ पित॑रः॒ सोम्या॑सः पा॒पमार्छ॑त्वपका॒मस्य॑ क॒र्ता ॥

द्यावा॑पृथिवी॒ इति॑ । अनु॑ । मा॒ । आ । दी॒धी॒था॒म् । विश्वे॑ । दे॒वा॒स॒: । अनु॑ । मा॒ । आ । र॒भ॒ध्व॒म् । अङ्गि॑रस: । पित॑र: । सोम्या॑स: । पा॒पम् । आ । ऋ॒च्छ॒तु॒ । अ॒प॒ऽका॒मस्य॑ । क॒र्ता ॥१२.५॥

Mantra without Swara
द्यावापृथिवी अनु मा दीधीथां विश्वे देवासो अनु मा रभध्वम्। अङ्गिरसः पितरः सोम्यासः पापमार्छत्वपकामस्य कर्ता ॥

द्यावापृथिवी इति । अनु । मा । आ । दीधीथाम् । विश्वे । देवास: । अनु । मा । आ । रभध्वम् । अङ्गिरस: । पितर: । सोम्यास: । पापम् । आ । ऋच्छतु । अपऽकामस्य । कर्ता ॥१२.५॥

Meaning
१. (द्यावापृथिवी) = द्युलोक व पृथिवीलोक (मा अनुदीधीथाम्) = मेरे अनुकूल होकर दीप्त हों। मेरे शरीर में मस्तिष्करूप झुलोक ज्ञान के सूर्य से चमके और पृथिवीरूप शरीर तेजस्विता से दीस बने । २. (विश्वेदेवास:) = सब देव (मा अनुरभध्वम्) = मेरे अनुकूल होकर कार्य करनेवाले हों। दिशाएँ मेरे श्रोत्रों को उपश्रुति [श्रवण शक्ति] दें, सूर्य आँखों में दृष्टिशक्ति दे, वायु प्राणशक्ति का वर्धन करे और अग्नि वाणी की शक्ति को दीस करे। इसीप्रकार अन्यान्य देवता भिन्न-भिन्न अङ्गों को सशक्त बनानेवाले हों। ३. (अङ्गिरस:) = अङ्गिरस (पितरः) = पितर व (सोम्यास:) = सौम्य ये सब भी मेरे अनुकूल होकर कार्य करनेवाले हों। अङ्गिरस मेरे अङ्गों को रसमय बनाएँ, पितर मेरा रक्षण करें व सौम्य मुझे विनीत बनाएँ। ४. इसप्रकार मेरे जीवन में सदा शुभ इच्छाएँ बनी रहें। (अपकामस्य कर्ता) = अशुभ इच्छाएँ करनेवाला व्यक्ति सदा (पापम् आर्छन्तु) = पाप को प्राप्त करे। अशुभ इच्छाओं का परिणाम 'अशुभ कर्म' तो होगा ही।
Essence
मेरी इच्छाएँ सदा शुभ बनी रहें, जिससे शुभ को करता हुआ मैं चमकूँ और शक्तिशाली बनें।

 
Subject
दीप्ति व शक्ति

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