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Atharvaveda - Mantra 5

Atharvaveda 2/1/5

36 Sukta
5 Mantra
2/1/5
Devata- ब्रह्मात्मा Rishi- वेनः Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- परमधाम सूक्त
Mantra with Swara
परि॒ विश्वा॒ भुव॑नान्यायमृ॒तस्य॒ तन्तुं॒ वित॑तं दृ॒शे कम्। यत्र॑ दे॒वा अ॒मृत॑मानशा॒नाः स॑मा॒ने योना॒वध्यैर॑यन्त ॥

परि॑ । विश्वा॑ । भुव॑नानि । आ॒य॒म् । ऋ॒तस्य॑ । तन्तु॑म्। विऽत॑तम् । दृ॒शे । कम् । यत्र॑ । दे॒वा: । अ॒मृत॑म् । आ॒न॒शा॒ना: । स॒मा॒ने । योनौ॑ । अधि॑ । ऐर॑यन्त ॥१.५॥

Mantra without Swara
परि विश्वा भुवनान्यायमृतस्य तन्तुं विततं दृशे कम्। यत्र देवा अमृतमानशानाः समाने योनावध्यैरयन्त ॥

परि । विश्वा । भुवनानि । आयम् । ऋतस्य । तन्तुम्। विऽततम् । दृशे । कम् । यत्र । देवा: । अमृतम् । आनशाना: । समाने । योनौ । अधि । ऐरयन्त ॥१.५॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. यह सारा ब्रह्माण्ड एक सूत्र में पुरोया हुआ है। इस (ऋतस्य) = ऋत के-पूर्ण सत्य के (विततम्) = विस्तृत (तन्तुम्) = सूत्ररूप कम्-आनन्दमय प्रभु को (दुशे) = देखने के लिए मैं विश्वा (भुवनानि परि आयम्) = सब लोकों में चारों ओर घूमा हूँ। इन लोकों के निरीक्षण से मुझे सर्वत्र ओत-प्रोत उस सूत्र की ही महिमा का दर्शन हुआ है। २.यह सूत्र वह है (यत्र) = जिसमें (देवा:) = देववृत्ति के ज्ञानी पुरुष (अमृतम् आनशाना:) = अमृतत्व का उपभोग करते हुए (समाने योनौ) = [सम्यक् आनयति] सबको प्राणित करनेवाले मूलस्थान प्रभु में (अध्यैश्यन्त) = गति करते हैं। अमृतत्व प्राप्त सब व्यक्तियों का वह ब्रह्म ही लोक है-सब मुक्त पुरुष समानरूप से उसी में विचरण करते हैं। वह प्रभु इन सब मुक्त पुरुषों का 'समान योनि' है।
Essence
प्रभु ही सब लोक-लोकान्तरों को अपने में पिरोये हुए हैं। सब मुक्त आत्मा भी उस प्रभु में निवास करते हैं। [संसारासक्त पुरुष प्रभु से दूर होते हुए कष्टभाक् होते हैं]।

 
Subject
वह विस्तृत सूत्र
Special
इस सम्पूर्ण सूक्त में बेन प्रभु का उपासन करता हुआ सारी सृष्टि को प्रभु की महिमा का प्रतिपादन करते हुए देखता है [१] उस प्रभु की महिमा का प्रतिपादन जितेन्द्रिय ज्ञानी पुरुष ही कर पाता है [२] वे प्रभु ही सब देवों के नाम को धारण करनेवाले हैं [३] वे संसार के धारक व अग्रणी हैं [४] वे ही सब लोकों में ओत-प्रोत सूत्र हैं [५]

- यह वेन उस प्रभु का ज्ञान प्राप्त करने के कारण अब 'मातृनामा' कहलाता है-'माता प्रमाता इति नाम यस्य'। यह वेदवाणी के धारक प्रभु की शक्तियों को-गन्धर्वपत्नियों को सर्वत्र प्रजाओं में विचरण करता हुआ देखता है, इसीलिए ये शक्तियाँ 'अप्सरस'-प्रजाओं में विचरण करनेवाली कहलायी हैं, अत: अगले सूक्त का ऋषि 'मातृनामा' है, विषय व देवता "गन्धर्वाप्सरसः' हैं-प्रभु की प्रजाओं में विचरण करनेवाली शक्तियाँ। यह मातृनामा स्तवन करता