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Atharvaveda - Mantra 4

Atharvaveda 2/1/4

36 Sukta
5 Mantra
2/1/4
Devata- ब्रह्मात्मा Rishi- वेनः Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- परमधाम सूक्त
Mantra with Swara
परि॒ द्यावा॑पृथि॒वी स॒द्य आ॑य॒मुपा॑तिष्ठे प्रथम॒जामृ॒तस्य॑। वाच॑मिव व॒क्तरि॑ भुवने॒ष्ठा धा॒स्युरे॒ष न॒न्वे॑३षो अ॒ग्निः ॥

परि॑ । द्यावा॑पृथि॒वी इति॑ । स॒द्य: । आ॒य॒म् । उप॑ । आ॒ऽति॒ष्ठे॒ । प्र॒थ॒म॒ऽजाम् । ऋ॒तस्य॑ ।वाच॑म्ऽइव । व॒क्तरि॑ । भु॒व॒ने॒ऽस्था: । धा॒स्यु: । ए॒ष: । न॒नु । ए॒ष: । अ॒ग्नि: ॥१.४॥

Mantra without Swara
परि द्यावापृथिवी सद्य आयमुपातिष्ठे प्रथमजामृतस्य। वाचमिव वक्तरि भुवनेष्ठा धास्युरेष नन्वे३षो अग्निः ॥

परि । द्यावापृथिवी इति । सद्य: । आयम् । उप । आऽतिष्ठे । प्रथमऽजाम् । ऋतस्य ।वाचम्ऽइव । वक्तरि । भुवनेऽस्था: । धास्यु: । एष: । ननु । एष: । अग्नि: ॥१.४॥

Meaning
१. मैं (सद्य:) = शीघ्र (द्यावापृथिवी) = द्युलोक व पृथिवीलोक में (परि आयम्) = चारों ओर भ्रमण कर आया हूँ। इन द्युलोक एवं पृथिवीलोक के पदार्थों का मैंने निरीक्षण किया है। मैंने इनके अन्दर प्रभु की महिमा को देखने का प्रयत्न किया है। इसके अतिरिक्त (ऋतस्य) = उस पूर्ण सत्य प्रभु की (प्रथमजाम्) = सृष्टि के आरम्भ में आविर्भूत हुई-हुई वाणी को (उपातिष्ठे) = मैंने उपासित किया है। सृष्टि के आरम्भ में दिये गये वेदज्ञान का मैंने अध्ययन किया है। २. संसार के देखने से तथा वेदवाणी के अध्ययन से मैं इसी परिणाम पर पहुँचा है कि (वक्तरि वाचम् इव) = वक्ता में वाणी की भाँति (भुवनेष्ठा:) = ये प्रभु सम्पूर्ण भुवनों में स्थित हैं। जैसे वक्ता में सूक्ष्मरूप से वाणी का निवास है, उसी प्रकार सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में उस सूक्ष्माति-सूक्ष्म प्रभु का निवास है। (एषः धास्यु:) = ये प्रभु ही इस ब्रह्माण्ड को धारण करनेवाले हैं। (नु) = निश्चय से (एष:) = ये प्रभु ही (अग्नि:) = अग्रणी हैं, सारे ब्रह्माण्ड को अग्रगति देनेवाले हैं।
Essence
संसार का निरीक्षण व वेदज्ञान का परीक्षण हमें एक ही परिणाम पर पहुँचाता है कि वे सूक्ष्मातिसूक्ष्म प्रभु ही इसके धारक व अग्रणी हैं।
Subject
'धास्यु व अग्नि' प्रभु

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