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Atharvaveda - Mantra 4

Atharvaveda 19/9/4

72 Sukta
14 Mantra
19/9/4
Devata- शान्तिः, मन्त्रोक्ताः Rishi- ब्रह्मा Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- शान्ति सूक्त
Mantra with Swara
इ॒दं यत्प॑रमे॒ष्ठिनं॒ मनो॑ वां॒ ब्रह्म॑संशितम्। येनै॒व स॑सृ॒जे घो॒रं तेनै॒व शान्ति॑रस्तु नः ॥

इ॒दम्। यत्। प॒र॒मे॒ऽस्थिन॑म्। मनः॑। वा॒म्। ब्रह्म॑ऽसंशितम्। येन॑। ए॒व। स॒सृ॒जे। घो॒रम्। तेन॑। ए॒व। शान्तिः॑। अ॒स्तु॒ । नः॒ ॥९.४॥

Mantra without Swara
इदं यत्परमेष्ठिनं मनो वां ब्रह्मसंशितम्। येनैव ससृजे घोरं तेनैव शान्तिरस्तु नः ॥

इदम्। यत्। परमेऽस्थिनम्। मनः। वाम्। ब्रह्मऽसंशितम्। येन। एव। ससृजे। घोरम्। तेन। एव। शान्तिः। अस्तु । नः ॥९.४॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (इदम) = यह (यत्) = जो (परमेष्ठिनम्) = परम स्थानों में स्थित होनेवाला अथवा प्रभु का-प्रभु से दिया गया (मन:) = मन है, (वाम्) = हे स्त्री-पुरुषो! आप दोनों का यह मन (ब्रह्मसंशितम्) = ज्ञान के द्वारा तीव्र किया गया है। ज्ञानी पुरुष का मन अत्यन्त प्रबल शक्तिवाला हो जाता है-वह चाहता है और वैसा हो जाता है। २. (येन) = जिस ब्रह्मसंशित मन के द्वारा (एव) = निश्चय से (घोरं ससृजे) = बड़ा भयंकर कार्य भी किया जा सकता है, (तेन) = उस मन से (न:) = हमारे लिए तो (शान्तिः एव अस्तु) = शान्ति ही हो। हम मन में किसी के लिए अशुभ कामना करें ही न। हमारा मन सदा सबके लिए शुभ कामनावाला हो।
Essence
हम ब्रह्मसंशित मन के द्वारा सदा सबके लिए शुभ कामना करते हुए प्रभु को प्राप्त करनेवाले बनें।
Subject
शुभकामना व ब्रह्म-प्राप्ति