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Atharvaveda - Mantra 5

Atharvaveda 19/7/5

72 Sukta
5 Mantra
19/7/5
Devata- नक्षत्राणि Rishi- गार्ग्यः Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- नक्षत्र सूक्त
Mantra with Swara
आ मे॑ म॒हच्छ॒तभि॑ष॒ग्वरी॑य॒ आ मे॑ द्व॒या प्रोष्ठ॑पदा सु॒शर्म॑। आ रे॒वती॑ चाश्व॒युजौ॒ भगं॑ म॒ आ मे॑ र॒यिं भर॑ण्य॒ आ व॑हन्तु ॥

आ। मे॒। म॒हत्। श॒तऽभि॑षक्। वरी॑यः। आ। मे॒। द्व॒या। प्रोष्ठ॑ऽपदा। सु॒ऽशर्म॑। आ। रे॒वती॑। च॒। अ॒श्व॒ऽयुजौ॑। भग॑म्। मे॒। आ। मे॒। र॒यिम्। भर॑ण्यः। आ। व॒ह॒न्तु॒ ॥७.५॥

Mantra without Swara
आ मे महच्छतभिषग्वरीय आ मे द्वया प्रोष्ठपदा सुशर्म। आ रेवती चाश्वयुजौ भगं म आ मे रयिं भरण्य आ वहन्तु ॥

आ। मे। महत्। शतऽभिषक्। वरीयः। आ। मे। द्वया। प्रोष्ठऽपदा। सुऽशर्म। आ। रेवती। च। अश्वऽयुजौ। भगम्। मे। आ। मे। रयिम्। भरण्यः। आ। वहन्तु ॥७.५॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. यह महत् (शतभिषक्) = महान् 'शतभिषक्' नामक नक्षत्र शतवर्षपर्यन्त नीरोग रहने की प्रेरणा देता हुआ (मे) = मेरे लिए (वरीय:) = [उरुतर] दीर्घजीवन को (आ) [वहतु] = प्राप्त कराए। इस नीरोग दीर्घजीवन में (द्वया प्रोष्ठपदा) = दोनों प्रोष्ठपदा नक्षत्र-पूर्वाभाद्रपदा और उत्तरा भाद्रपदा मुझे कल्याण के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते हुए (मे) = मेरे लिए (सशर्म) = उत्तम सुख को (आ) [वहताम्] = प्राप्त कराएँ । २. अब (रेवती आश्वयुजौ च) = रेवती और आश्वयुज् नक्षत्र मुझे ज्ञानेश्वर्य प्राप्त करने की तथा कर्मेन्द्रियों को यज्ञ आदि कर्मों में लगाये रखने की प्रेरणा देते हुए (मे) = मेरे लिए (भगम्) = ऐश्वर्य को (आ) [वहन्तु] = प्रास कराएँ और अन्ततः (भरण्यः) = भरणी नक्षत्र मुझे आत्मम्भरि न बनकर सबके भरण की प्रेरणा देते हुए (रयिम्) = धन को (आहवन्तु) = प्राप्त कराएँ । जब मैं सबके भरण के कार्यों में प्रवृत्त होता हूँ तब उसके लिए आवश्यक साधनभूत धन को प्रभु प्राप्त कराते ही हैं।
Essence
मैं शतवर्षपर्यन्त नीरोग जीवन बिताने का ध्यान करूँ। उसके लिए सदा कल्याण के मार्ग का आक्रमण करूँ। ज्ञानेश्वर्य को प्राप्त करनेवाला व कर्मेन्द्रियों को यज्ञों में व्याप्त रखनेवाला बनूँ। अन्ततः आत्मम्भरि न बनकर सबका भरण करनेवाला बनूं। अगले सूक्त के ऋषि देवता भी 'गार्य' और 'नक्षत्राणि' ही हैं -
Subject
'शतभिषक् से भरणी' तक