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Atharvaveda - Mantra 5

Atharvaveda 19/6/5

72 Sukta
16 Mantra
19/6/5
Devata- पुरुषः Rishi- नारायणः Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- जगद्बीजपुरुष सूक्त
Mantra with Swara
यत्पुरु॑षं॒ व्यद॑धुः कति॒धा व्यकल्पयन्। मुखं॒ किम॑स्य॒ किं बा॒हू किमू॒रू पादा॑ उच्यते ॥

यत्। पुरु॑षम्। वि। अद॑धुः। क॒ति॒ऽधा। वि। अ॒क॒ल्प॒य॒न्। मुख॑म्। किम्। अ॒स्य॒। किम्। बा॒हू इति॑। किम्। ऊ॒रू इति॑। पादौ॑। उ॒च्ये॒ते॒ इति॑ ॥६.५॥

Mantra without Swara
यत्पुरुषं व्यदधुः कतिधा व्यकल्पयन्। मुखं किमस्य किं बाहू किमूरू पादा उच्यते ॥

यत्। पुरुषम्। वि। अदधुः। कतिऽधा। वि। अकल्पयन्। मुखम्। किम्। अस्य। किम्। बाहू इति। किम्। ऊरू इति। पादौ। उच्येते इति ॥६.५॥

Meaning
१. (यत्) = जब साधनामय जीवनवाले पुरुष (पुरुषम्) = उस परमपुरुष प्रभु को (व्यदधुः) = अपने में विशेष रूप से धारण करते हैं तब वे (कतिधा) = कितने प्रकार से (व्यकल्पयन्) = अपने को विशिष्ट सामर्थ्यवाला बनाते हैं। प्रभु का धारण करनेवाला प्रभु की शक्ति से शक्तिसम्पन्न होकर असामान्य शक्तिवाला हो जाता है। २. (अस्य) = इस प्रभु के धारण करनेवाले का (मुखं किम्) = मुख क्या बन जाता है? सामान्य व्यक्ति व इस साधक के मुख में क्या अन्तर होता है? (किं बाह) = इसकी बाहुएँ (किम् उच्यते) = क्या कही जाती है? (उरू किम्) = जाँ क्या कही जाती है? और इसीप्रकार (पादा:) = इसके पाँव [किम् उच्यते] क्या कहे जाते हैं, अर्थात् इस साधक के मुख, भुजाओं, जाँघों व पाँवों की क्रियाओं में क्या अन्तर आ जाता है? प्रभु के धारण से इसके अंगों में क्या विशेषता उत्पन्न होती है?
Essence
जिज्ञासु प्रश्न करता है कि साधक के अंगों में प्रभु के धारण से किस अद्भत् शक्ति का प्रादुर्भाव होता है? प्रश्न का उत्तर अगले मन्त्र में देते हैं।
Subject
प्रभु का धारण

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