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Atharvaveda - Mantra 3

Atharvaveda 19/4/3

72 Sukta
4 Mantra
19/4/3
Devata- अग्निः Rishi- अथर्वाङ्गिराः Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- आकूति सूक्त
Mantra with Swara
आकू॑त्या नो बृहस्पत॒ आकू॑त्या न॒ उपा ग॑हि। अथो॒ भग॑स्य नो धे॒ह्यथो॑ नः सु॒हवो॑ भव ॥

आऽकू॑त्या। नः॒। बृ॒ह॒स्प॒ते॒। आऽकू॑त्या। नः॒।उप॑। आ। ग॒हि॒। अथो॒ इति॑। भग॑स्य। नः॒। धे॒हि॒। अथो॒ इति॑।नः॒। सु॒ऽहवः॑। भ॒व॒ ॥४.३॥

Mantra without Swara
आकूत्या नो बृहस्पत आकूत्या न उपा गहि। अथो भगस्य नो धेह्यथो नः सुहवो भव ॥

आऽकूत्या। नः। बृहस्पते। आऽकूत्या। नः।उप। आ। गहि। अथो इति। भगस्य। नः। धेहि। अथो इति।नः। सुऽहवः। भव ॥४.३॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. हे (बृहस्पते) = वेदज्ञान के स्वामिन् प्रभो! [ब्रह्मणस्पते] आप (आकूत्या) = संकल्पशक्ति के साथ (न:) = हमें (उप आगहि) = समीपता से प्राप्त होइए। अवश्य ही इस (आकूत्या न:) = संकल्पशक्ति पदार्थों को के साथ हमें प्राप्त होइए। आप हमें संकल्पशक्ति को अवश्य ही प्राप्त कराइए । २. (अथ) = अब संकल्पशक्ति को प्राप्त कराने के द्वारा अवश्य ही (नः भगस्य धेहि) = हमारे लिए ऐश्वर्य को [सौभाग्य को] धारण कोजिए। हम संकल्प के द्वारा ऐश्वर्यसम्पन्न बने। (अथ उ) = और निश्चय से (आपन:) = हमारे लिए (सुहव:) = सुगमता से आराधन के योग्य (भव) = होइए। इस संकल्प के द्वारा हम आपको प्राप्त करनेवाले बनें।
Essence
प्रभु हमें संकल्पशक्ति दें। इस संकल्पशक्ति से हम ऐश्वर्य-सिद्ध करते हुए प्रभु को प्राप्त करनेवाले बनें। ऐश्वर्य ही अभ्युदय' है, प्रभु-प्राप्ति व निःश्रेयस-इन दोनों को प्रास करानेवाला यह संकल्प है।
Subject
अभ्युदय व निःश्रेयस' का साधक संकल्प