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Atharvaveda - Mantra 1

Atharvaveda 19/28/1

72 Sukta
10 Mantra
19/28/1
Devata- दर्भमणिः Rishi- ब्रह्मा Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- दर्भमणि सूक्त
Mantra with Swara
इ॒मं ब॑ध्नामि ते म॒णिं दी॑र्घायु॒त्वाय॒ तेज॑से। द॒र्भं स॑पत्न॒दम्भ॑नं द्विष॒तस्तप॑नं हृ॒दः ॥

इ॒मम्। ब॒ध्ना॒मि॒। ते॒। म॒णिम्। दी॒र्घा॒यु॒ऽत्वाय॑। तेज॑से। द॒र्भम्। स॒प॒त्न॒ऽदम्भ॑नम्। द्वि॒ष॒तः। तप॑नम्। हृ॒दः ॥२८.१॥‍

Mantra without Swara
इमं बध्नामि ते मणिं दीर्घायुत्वाय तेजसे। दर्भं सपत्नदम्भनं द्विषतस्तपनं हृदः ॥

इमम्। बध्नामि। ते। मणिम्। दीर्घायुऽत्वाय। तेजसे। दर्भम्। सपत्नऽदम्भनम्। द्विषतः। तपनम्। हृदः ॥२८.१॥‍

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1 Bhashyas
Meaning
१. 'आपो दर्भाः श० २.२.३.११' इस वाक्य के अनुसार 'आप:' ही 'दर्भ:' कहलाते हैं। 'आप:' शरीरस्थ रेत:कणों का नाम है, अत: रेत:कण ही 'दर्भ' कहे गये हैं। रेत: कण 'मणि' व 'रत्न' हैं-शरीर में रमणीयतम वस्तु हैं, अत: 'दर्भमणि' शब्द का प्रयोग इन रेत:कणों के लिए हुआ है। (इमम्) = इस (मणिम्) = मणि को (ते बध्नामि) = तेरे लिए बाँधता हूँ। शरीर में इसे सुबद्ध करता है, ताकि (दीर्घायुत्वाय) = तुझे दीर्घजीवन प्राप्त हो तथा (तेजसे) = तू तेजस्वी बने। २. इस (दर्भम्) = दर्भ को मैं तेरे लिए बाँधता हूँ, क्योंकि [दुभ to fear, to be afraid of] इससे सब रोग भयभीत होते हैं। (सपत्नदम्भनम्) = यह तो रोगरूप शत्रुओं को हिंसित करनेवाला है। (द्विषतः हृदः तपनम्) = ये दर्भ हमसे प्रीति न करनेवाले शत्रु के हृदय को संतप्त करनेवाले हैं। शरीर में दर्भ का बन्धन होने पर शरीर में रोगरूप शत्रुओं का वास नहीं हो पाता।
Essence
शरीर में वीर्यकों के रूप में रहनेवाले 'आप:' ही 'दर्भ' हैं। इनका शरीर में बंधन होने पर वहाँ रोगरूप शत्रु नहीं आ सकते। यह रोगों से अनाक्रान्त व्यक्ति दीर्घजीवी व तेजस्वी बनता है।
Subject
दीर्घायुत्वाय, तेजसे