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Atharvaveda - Mantra 9

Atharvaveda 19/27/9

72 Sukta
15 Mantra
19/27/9
Devata- त्रिवृत् Rishi- भृग्वङ्गिराः Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- सुरक्षा सूक्त
Mantra with Swara
दे॒वानां॒ निहि॑तं नि॒धिं यमिन्द्रो॒ऽन्ववि॑न्दत्प॒थिभि॑र्देव॒यानैः॑। आपो॒ हिर॑ण्यं जुगुपुस्त्रि॒वृद्भि॒स्तास्त्वा॑ रक्षन्तु त्रि॒वृता॑ त्रि॒वृद्भिः॑ ॥

दे॒वाना॑म्। निऽहि॑तम्। नि॒ऽधिम्। यम्। इन्द्रः॑। अ॒नु॒ऽअवि॑न्दत्। प॒थिऽभिः॑। दे॒व॒ऽयानैः॑। आपः॑। हिर॑ण्यम्। जु॒गु॒षुः॒। त्रि॒वृत्ऽभिः॑। ताः। त्वा॒। र॒क्ष॒न्तु॒। त्रि॒ऽवृता॑। त्रि॒वृत्ऽभिः॑ ॥२७.९॥

Mantra without Swara
देवानां निहितं निधिं यमिन्द्रोऽन्वविन्दत्पथिभिर्देवयानैः। आपो हिरण्यं जुगुपुस्त्रिवृद्भिस्तास्त्वा रक्षन्तु त्रिवृता त्रिवृद्भिः ॥

देवानाम्। निऽहितम्। निऽधिम्। यम्। इन्द्रः। अनुऽअविन्दत्। पथिऽभिः। देवऽयानैः। आपः। हिरण्यम्। जुगुषुः। त्रिवृत्ऽभिः। ताः। त्वा। रक्षन्तु। त्रिऽवृता। त्रिवृत्ऽभिः ॥२७.९॥

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Meaning
१. (देवानाम्) = देववृत्ति के पुरुषों के द्वारा (निहितम्) = अपने शरीर में स्थापित (निधिम्) = निधि को-कोश को (यम्) = जिस निधि को (इन्द्रः) = देवताओं का मुखिया जितेन्द्रिय पुरुष (देवयानैः पथिभिः) = देवयान मार्गों से-देवोचित कर्मों को ही करते रहने से (अन्वविन्दत) = प्राप्त करता है। उस (हिरण्यम्) = हितरमणीय वीर्य को (आप:) = कमों में व्याप्त रहनेवाली प्रजाएँ त्(रिवृद्धिः) = 'ज्ञान, कर्म व उपासना' में लगे रहने से (जुगपुः) = रक्षित करती हैं। २. हे हिरण्य! (ता:) = वे प्रजाएँ (त्वा) = तुझे (त्रिवृता) = शक्ति, भक्ति व ज्ञान' में वर्तन के हेतु से (त्रिवृद्धिः) = सदा 'ज्ञान, कर्म व उपासना' में लगे रहने के द्वारा (रक्षन्तु) = रक्षित करें । सुरक्षित वीर्य 'शक्ति, भक्ति व ज्ञान' को बढ़ाता है। इसप्रकार हमें शारीरिक, मानस व बौद्धिक स्वास्थ्य प्राप्त होता है।
Essence
देवयान मार्गों से चलने पर जितेन्द्रिय बनते हुए हम 'हिरण्य' का रक्षण करते हैं। यह हमारे अन्दर शक्ति, पवित्रता व ज्ञान का संचार करता है। हमारा जीवन 'ज्ञान, कर्म व उपासना' मय बनता है।
Subject
देवनिधि 'हिरण्य'