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Atharvaveda - Mantra 6

Atharvaveda 19/24/6

72 Sukta
8 Mantra
19/24/6
Devata- मन्त्रोक्ताः Rishi- अथर्वा Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- राष्ट्रसूक्त
Mantra with Swara
परी॒दं वासो॑ अधिथाः स्व॒स्तयेऽभू॑र्वापी॒नाम॑भिशस्ति॒पा उ॑। श॒तं च॒ जीव॑ श॒रदः॑ पुरू॒चीर्वसू॑नि॒ चारु॒र्वि भ॑जासि॒ जीव॑न् ॥

परि॑। इ॒दम् । वासः॑। अ॒धि॒थाः॒। स्व॒स्तये॑। अभूः॑। वा॒पी॒नाम्। अ॒भि॒श॒स्ति॒ऽपाः। ऊं॒ इति॑। श॒तम्। च॒। जीव॑। श॒रदः॑। पु॒रू॒चीः। वसू॑नि। चारुः॑। वि। भ॒जा॒सि॒। जीव॑न् ॥२४.६॥

Mantra without Swara
परीदं वासो अधिथाः स्वस्तयेऽभूर्वापीनामभिशस्तिपा उ। शतं च जीव शरदः पुरूचीर्वसूनि चारुर्वि भजासि जीवन् ॥

परि। इदम् । वासः। अधिथाः। स्वस्तये। अभूः। वापीनाम्। अभिशस्तिऽपाः। ऊं इति। शतम्। च। जीव। शरदः। पुरूचीः। वसूनि। चारुः। वि। भजासि। जीवन् ॥२४.६॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. हे मनुष्य! तू (इदं वास:) = इस ज्ञानवस्त्र को (परि अधिथा:) = सम्यक् धारण करनेवाला बन-इससे तू चारों ओर से अपने को ढक ले। इसके धारण से तू (स्वस्तये अभूः) = कल्याण के लिए हो (उ) = और निश्चय से (वापीनाम्) = उत्तम गुणों के बीजों का वपन करनेवाली इन ज्ञानवाणियों का (अभिशस्तिपा:) = हिंसन से रक्षण करनेवाला हो। तू स्वाध्याय में कभी विच्छेद करनेवाला न बन २. (च) = और (पुरूची:) = खूब ही गतिवाली (शतं शरदः) = सौ शरद् ऋतुओं तक तू (जीव) = जी और (जीवन) = जीवन को धारण करता हुआ तू (चारु:) = चरणशील होता है-भक्षण की क्रियावाला होता है। तू जीने के लिए ही खाता है। विलास में धन का व्यय कभी नहीं करता। तू इन (वसूनि) = धनों को विभजासि सबके प्रति विभक्त करनेवाला होता है-यज्ञों के द्वारा तू इसे सभी के प्रति विभक्त करता है। स्वयं यज्ञशेष का ही सेवन करता है।
Essence
ज्ञानवस्त्र को धारण करके हम अपना रक्षण करते हुए कल्याण प्राप्त करें। ज्ञान वाणियों का सदा रक्षण करते हुए उत्तम गुणों के बीजों को अपने में बोएँ । दीर्घकाल तक जीएँ। केवल शरीर-रक्षण के लिए भोजन करता हुआ तू धन को विभक्त कर।
Subject
वापी-रक्षण