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Atharvaveda - Mantra 4

Atharvaveda 19/24/4

72 Sukta
8 Mantra
19/24/4
Devata- मन्त्रोक्ताः Rishi- अथर्वा Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- राष्ट्रसूक्त
Mantra with Swara
परि॑ धत्त ध॒त्त नो॒ वर्च॑से॒मं ज॒रामृ॑त्युं कृणुत दी॒र्घमायुः॑। बृह॒स्पतिः॒ प्राय॑च्छ॒द्वास॑ ए॒तत्सोमा॑य॒ राज्ञे॒ परि॑धात॒वा उ॑ ॥

परि॑। ध॒त्त॒। ध॒त्त। नः॒। वर्च॑सा। इ॒मम्। ज॒राऽमृ॑त्युम्। कृ॒णु॒त॒। दी॒र्घम्। आयुः॑। बृह॒स्पतिः॑। प्र। अ॒य॒च्छ॒त्। वासः॑। ए॒तत्। सोमा॑य। राज्ञे॑। परि॑ऽधात॒वै। ऊं॒ इति॑ ॥२४.४॥

Mantra without Swara
परि धत्त धत्त नो वर्चसेमं जरामृत्युं कृणुत दीर्घमायुः। बृहस्पतिः प्रायच्छद्वास एतत्सोमाय राज्ञे परिधातवा उ ॥

परि। धत्त। धत्त। नः। वर्चसा। इमम्। जराऽमृत्युम्। कृणुत। दीर्घम्। आयुः। बृहस्पतिः। प्र। अयच्छत्। वासः। एतत्। सोमाय। राज्ञे। परिऽधातवै। ऊं इति ॥२४.४॥

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Meaning
१. हे देवो! आप (न:) = हमारे (इयम्) = इस व्यक्ति को (परिधत्तन) = ज्ञानरूप वस्त्र धारण कराओ और इसप्रकार इसे वासनाओं से ऊपर उठाकर (वर्चसा धत्त) = शक्ति के साथ धारण करो। इसके जीवन को आप शक्तिशाली बनाओ। इसे शक्ति-सम्पन्न बनाकर इसके लिए (जरामृत्युम्) = अत्यन्त वृद्धावस्था में मृत्युवाले (दीर्घमायुः) = दीर्घजीवन को (कृणुत) = करो। २. (ब्रहस्पति:) = ज्ञान का स्वामी सबका आचार्य प्रभु (एतत् वास:) = इस ज्ञान-वस्त्र को (परिधातवा उ) = निश्चय से धारण करने के लिए (सोमाय) = सौम्य स्वभाववाले-विनीत (राज्ञे) = जितेन्द्रिय-इन्द्रियों के राजा-व्यवस्थित जीवनवाले विद्यार्थी के लिए प्रायच्छत् देता है।
Essence
देव हमें ज्ञान-वस्त्र को धारण कराके दीर्घजीवनवाला बनाएँ। ज्ञान का स्वामी आचार्य सौम्य व जितेन्द्रिय विद्यार्थी को ज्ञान देता है।
Subject
ज्ञानवस्त्रों का धारण