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Atharvaveda - Mantra 9

Atharvaveda 19/23/9

72 Sukta
30 Mantra
19/23/9
Devata- मन्त्रोक्ताः Rishi- अथर्वा Chhanda- दैवी जगती Suktam- अथर्वाण सूक्त
Mantra with Swara
द्वा॑दश॒र्चेभ्यः॒ स्वाहा॑ ॥

द्वा॒द॒श॒ऽऋ॒चेभ्यः॑। स्वाहा॑ ॥२३.९॥

Mantra without Swara
द्वादशर्चेभ्यः स्वाहा ॥

द्वादशऽऋचेभ्यः। स्वाहा ॥२३.९॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (द्वादशचेंभ्यः स्वाहा) = बारह आदित्यों [चैत्र आदि १२ मासों] का स्तवन व प्रतिपादन करनेवाले मन्त्रों के लिए हम प्रशंसात्मक शब्द कहते हैं। इनके अध्ययन से इन बारह मासों के अनुरूप आहार-विहार को अपनाते हुए आदित्यसम दीप्त-जीवनवाले बनते हैं। २. (त्रयोदशर्चेभ्यः स्वाहा) = पाँच यमों [अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह] तथा पाँच नियमों [शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वरप्रणिधान] और उनके पालन से स्वस्थ होनेवाले 'शरीर, मन व बुद्धि' का स्तवन करनेवाले मन्त्रों के लिए हम प्रशंसात्मक शब्द कहते हैं और यम-नियमों का पालन करते हुए हम त्रिविध स्वस्थ्य को प्राप्त करते हैं। ३. (चतुर्दशर्चेभ्यः स्वाहा) = चतुर्दश विद्याओं का [षडङ्गमिश्रिता वेदा धर्मशास्त्रां पुराणकम्। मीमांसा तर्कमपि च एता विद्याश्चतुर्दश] शंसन करनेवाले मन्त्रों का शंसन करते हुए हम इन चौदह विद्याओं को प्राप्त करने का प्रयत्न करते हैं। ४. (पञ्चदशचेभ्यः स्वाहा) = द्विविधगन्ध [सुरभि-असुरभि] षड् रस [कषाय, मधुर, लवण, कटु, तिक्त, अम्ल], सप्तवर्ण [सूर्य की सात रंग की किरणें]-इन पन्द्रह का वर्णन करनेवाली ऋचाओं के लिए हम प्रशंसात्मक शब्द कहते हैं और इनका यथायोग करते हुए स्वस्थ बनते हैं।
Essence
हम बारह आदित्यों को समझें। दश यम-नियमों व उनसे स्वस्थ बननेवाले शरीर, मन व बुद्धि को समझें। चौदह विद्याओं को जानने के लिए यत्नशील हों और 'द्विविध गन्ध, षड् रसों व सप्त वर्णों को समझकर' उनका ठीक प्रयोग करनेवाले बनें।
Subject
बुद्धि, चौदह विद्याएँ, १५ गन्ध