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Atharvaveda - Mantra 18

Atharvaveda 19/23/18

72 Sukta
30 Mantra
19/23/18
Devata- मन्त्रोक्ताः Rishi- अथर्वा Chhanda- दैवी जगती Suktam- अथर्वाण सूक्त
Mantra with Swara
म॑हत्का॒ण्डाय॒ स्वाहा॑ ॥

म॒ह॒त्ऽका॒ण्डाय॑। स्वाहा॑ ॥२३.१८॥

Mantra without Swara
महत्काण्डाय स्वाहा ॥

महत्ऽकाण्डाय। स्वाहा ॥२३.१८॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. [कडि भेदने संरक्षणे च] (महत्काण्डाय) = महान् अविद्या का भेदन करनेवाले व हमारा संरक्षण करनेवाले वेदज्ञान के लिए (स्वाहा) = मैं अपना अर्पण करता हूँ। २. (तचेभ्य:) = 'जीव, प्रकृति, परमात्मा' अथवा 'ज्ञान, कर्म, उपासना' तीनों का प्रतिपादन करनेवाले इन मन्त्रों के लिए (स्वाहा) = अपना अर्पण करता हैं। ३. (एकर्चेभ्य:) = उस एक अद्वितीय प्रभु की महिमा का स्तवन करनेवाले मन्त्रों के लिए (स्वाहा) = मैं अपना अर्पण करता हूँ। उनके पढ़ने के लिए यत्नशील होता हूँ। [शुदिर संपेषणे] (क्षद्रेभ्यः) = अविद्यान्धकार का संपेषण करनेवाले इन वेदमन्त्रों के लिए स्वाहा-मैं अपना अर्पण करता हूँ। ५. (एकानृचेभ्यः स्वाहा) = [नास्ति ऋक्-स्तुत्याविद्याः-यस्य सकाशात् स: 'अनृच'] उस ब्रह्मविद्या का वर्णन करनेवाली अनुत्तम [सर्वोत्तम] ऋचाओं के लिए मैं अपने को अर्पित करता हूँ।
Essence
अज्ञान के विध्वंसक वेदमन्त्रों का अध्ययन करते हुए हम उस अद्वितीय प्रभु को जानने के लिए यत्नशील होते हैं।
Subject
अज्ञान विध्वंस व प्रभु-दर्शन