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Atharvaveda - Mantra 3

Atharvaveda 19/19/3

72 Sukta
11 Mantra
19/19/3
Devata- चन्द्रमाः, मन्त्रोक्ताः Rishi- अथर्वा Chhanda- भुरिग्बृहती Suktam- शर्म सूक्त
Mantra with Swara
सूर्यो॑ दि॒वोद॑क्राम॒त्तां पुरं॒ प्र ण॑यामि वः। तामा वि॑शत॒ तां प्र वि॑शत॒ सा वः॒ शर्म॑ च॒ वर्म॑ च यच्छतु ॥

सूर्यः॑। दि॒वा। उत्। अ॒क्रा॒म॒त्। ताम्। पुर॑म्। प्र। न॒या॒मि॒। वः॒। ताम्। आ। वि॒श॒त॒। ताम्। प्र। वि॒श॒त॒। सा। वः॒। शर्म॑। च॒। वर्म॑। च॒। य॒च्छ॒तु॒ ॥१९.३॥

Mantra without Swara
सूर्यो दिवोदक्रामत्तां पुरं प्र णयामि वः। तामा विशत तां प्र विशत सा वः शर्म च वर्म च यच्छतु ॥

सूर्यः। दिवा। उत्। अक्रामत्। ताम्। पुरम्। प्र। नयामि। वः। ताम्। आ। विशत। ताम्। प्र। विशत। सा। वः। शर्म। च। वर्म। च। यच्छतु ॥१९.३॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (सूर्यः) = [सरति] निरन्तर अपने मार्ग पर आगे बढ़नेवाला पुरुष (दिव) = ज्ञान के प्रकाश से (उदक्रामत्) = उन्नत होता है। २. निरन्तर श्रम द्वारा ज्ञान को प्राप्त करनेवाले तुम्हें [व:] मैं ब्रह्मपुरी की ओर ले-चलता हूँ। शेष पूर्ववत्।
Essence
हम निरन्तर श्रम द्वारा अत्यधिक ज्ञान प्राप्त करें। यही मार्ग है ब्रह्म को प्राप्त करने का।
Subject
निरन्तर गतिशीलता व प्रकाश