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Atharvaveda - Mantra 2

Atharvaveda 19/19/2

72 Sukta
11 Mantra
19/19/2
Devata- चन्द्रमाः, मन्त्रोक्ताः Rishi- अथर्वा Chhanda- अनुष्टुब्गर्भा पङ्क्तिः Suktam- शर्म सूक्त
Mantra with Swara
वा॒युर॒न्तरि॑क्षे॒णोद॑क्राम॒त्तां पुरं॒ प्र ण॑यामि वः। तामा वि॑शत॒ तां प्र वि॑शत॒ सा वः॒ शर्म॑ च॒ वर्म॑ च यच्छतु ॥

वा॒युः। अ॒न्तरि॑क्षेण‍। उत्। अ॒क्रा॒म॒त्। ताम्। पुर॑म्। प्र। न॒या॒मि॒। वः॒। ताम्। आ। वि॒श॒त॒। ताम्। प्र। वि॒श॒त॒। सा। वः॒। शर्म॑। च॒। वर्म॑। च॒। य॒च्छ॒तु॒ ॥१९.२॥

Mantra without Swara
वायुरन्तरिक्षेणोदक्रामत्तां पुरं प्र णयामि वः। तामा विशत तां प्र विशत सा वः शर्म च वर्म च यच्छतु ॥

वायुः। अन्तरिक्षेण‍। उत्। अक्रामत्। ताम्। पुरम्। प्र। नयामि। वः। ताम्। आ। विशत। ताम्। प्र। विशत। सा। वः। शर्म। च। वर्म। च। यच्छतु ॥१९.२॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (वायु:) = [वा गतौ गन्धने च] गति के द्वारा सब बुराइयों का संहार करनेवाला अन्तरिक्षण हृदयान्तरिक्ष के दृष्टिकोण से (उदकामत्) = उन्नत होता है। हृदय में कर्मसंकल्प होने पर हृदय पवित्र बना रहता है। २. (वः) = क्रियाशीलता के द्वारा हृदय को पवित्र रखनेवाले तुम्हें (तां पुरम्) = उस ब्रह्मपुरी की ओर (प्रणयामि) = ले-चलता हूँ। शेष पूर्ववत् ।
Essence
हम क्रियाशीलता के द्वारा पवित्र हृदय बनें। ये ही ब्रह्मपुरी के यात्री बन पाते हैं।
Subject
क्रियाशीलता व हृदय की पवित्रता