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Atharvaveda - Mantra 10

Atharvaveda 19/18/10

72 Sukta
10 Mantra
19/18/10
Devata- मन्त्रोक्ताः Rishi- अथर्वा Chhanda- प्राजापत्या त्रिष्टुप् Suktam- सुरक्षा सूक्त
Mantra with Swara
बृह॒स्पतिं॒ ते वि॒श्वदे॑ववन्तमृच्छन्तु। ये मा॑ऽघा॒यव॑ ऊ॒र्ध्वाया॑ दि॒शोऽभि॒दासा॑त् ॥

बृह॒स्पति॑म्। ते। वि॒श्वदे॑वऽवन्तम्। ऋ॒च्छ॒न्तु॒। ये। मा॒। अ॒घ॒ऽयवः॑। ऊ॒र्ध्वायाः॑। दि॒शः। अ॒भि॒ऽदासा॑त् ॥१८.१०॥

Mantra without Swara
बृहस्पतिं ते विश्वदेववन्तमृच्छन्तु। ये माऽघायव ऊर्ध्वाया दिशोऽभिदासात् ॥

बृहस्पतिम्। ते। विश्वदेवऽवन्तम्। ऋच्छन्तु। ये। मा। अघऽयवः। ऊर्ध्वायाः। दिशः। अभिऽदासात् ॥१८.१०॥

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Meaning
१. (ये) = जो (अघायवः) = अशुभ चाहनेवाली पापवृत्तियाँ (मा) = मुझे (ऊर्ध्वायाः दिश:) = ऊर्ध्वा दिक् से (अभिदासात्) = उपक्षीण करती हैं, (ते) = वे (विश्वदेववन्तम्) = सब प्रशस्त दिव्यगुणों को प्राप्त करानेवाले (बृहस्पतिम्) = ज्ञान के स्वामी प्रभु को (ऋच्छन्तु) = प्राप्त होकर नष्ट हो जाएँ। २. इस ऊर्ध्वादिक् की ओर से 'बृहस्पति' प्रभु मेरा रक्षण कर रहे है-वे मुझे सब दिव्यगुणों को प्राप्त कराते हैं। ऐसी स्थिति में वे पापप्रवृत्तियों मेरे समीप फटक ही नहीं पाती।
Essence
मैं ज्ञान की रुचिवाला बनूँ और इसप्रकार सब व्यसनों से अपने को बचा पाऊँ।
Subject
ज्ञान व निष्पापता