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Atharvaveda - Mantra 5

Atharvaveda 19/17/5

72 Sukta
10 Mantra
19/17/5
Devata- मन्त्रोक्ताः Rishi- अथर्वा Chhanda- अतिजगती Suktam- सुरक्षा सूक्त
Mantra with Swara
सूर्यो॑ मा॒ द्यावा॑पृथि॒वीभ्यां॑ प्र॒तीच्या॑ दि॒शः पा॑तु॒ तस्मि॑न्क्रमे॒ तस्मि॑ञ्छ्रये॒ तां पुरं॒ प्रैमि॑। स मा॑ रक्षतु॒ स मा॑ गोपायतु॒ तस्मा॑ आ॒त्मानं॒ परि॑ ददे॒ स्वाहा॑ ॥

सूर्यः॑। मा॒। द्यावा॑पृथि॒वीभ्या॑म्। प्र॒तीच्याः॑। दि॒शः। पा॒तु॒। तस्मि॑न्। क्र॒मे॒। तस्मि॑न्। श्र॒ये॒। ताम्। पुर॑म्। प्र। ए॒मि॒। सः। मा॒। र॒क्ष॒तु॒। सः। मा॒। गो॒पा॒य॒तु॒। तस्मै॑। आ॒त्मान॑म्। परि॑। द॒दे॒। स्वाहा॑ ॥१७.५॥

Mantra without Swara
सूर्यो मा द्यावापृथिवीभ्यां प्रतीच्या दिशः पातु तस्मिन्क्रमे तस्मिञ्छ्रये तां पुरं प्रैमि। स मा रक्षतु स मा गोपायतु तस्मा आत्मानं परि ददे स्वाहा ॥

सूर्यः। मा। द्यावापृथिवीभ्याम्। प्रतीच्याः। दिशः। पातु। तस्मिन्। क्रमे। तस्मिन्। श्रये। ताम्। पुरम्। प्र। एमि। सः। मा। रक्षतु। सः। मा। गोपायतु। तस्मै। आत्मानम्। परि। ददे। स्वाहा ॥१७.५॥

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Meaning
१. [सरति इति] (सूर्य:) = निरन्तर गतिवाले दीप्त प्रभु [ब्रह्म सर्वसमं ज्योतिः] (द्यावा पृथिवीभ्याम्) = द्युलोक व पृथिवीलोक के साथ-दीप्त मस्तिष्क [धुलोक] व दृढ़ शरीर [पृथिवी] के साथ (प्रतीच्याः दिश:) = पश्चिम दिशा से (मा) = मुझे (पातु) = रक्षित करें। २. (तस्मिन् क्रमे) = उन्हीं में मैं गति करूँ। शेष पूर्ववत्।
Essence
पश्चिम में मैं सूर्यरूप प्रभु को उपस्थित देखू। वे मुझे दीप्त मस्तिष्क व दृढ़ शरीर प्राप्त कराते हैं। उन्हीं में मैं गति करूँ।
Subject
द्यावापृथिवी के साथ 'सूर्य' पश्चिम में