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Atharvaveda - Mantra 1

Atharvaveda 19/17/1

72 Sukta
10 Mantra
19/17/1
Devata- मन्त्रोक्ताः Rishi- अथर्वा Chhanda- उपजगती Suktam- सुरक्षा सूक्त
Mantra with Swara
अ॒ग्निर्मा॑ पातु॒ वसु॑भिः पु॒रस्ता॒त्तस्मि॑न्क्रमे॒ तस्मि॑ञ्छ्रये॒ तां पुरं॒ प्रैमि॑। स मा॑ रक्षतु॒ स मा॑ गोपायतु॒ तस्मा॑ आ॒त्मानं॒ परि॑ ददे॒ स्वाह॑ ॥

अ॒ग्निः। मा॒। पा॒तु॒। वसु॑ऽभिः। पु॒रस्ता॑त्। तस्मि॑न्। क्र॒मे॒। तस्मि॑न्। श्र॒ये॒। ताम्। पुर॑म्। प्र। ए॒मि॒। सः। मा॒। र॒क्ष॒तु॒। सः। मा॒। गो॒पा॒य॒तु॒। तस्मै॑। आ॒त्मान॑म्। परि॑। द॒दे॒। स्वाहा॑। १७.१॥

Mantra without Swara
अग्निर्मा पातु वसुभिः पुरस्तात्तस्मिन्क्रमे तस्मिञ्छ्रये तां पुरं प्रैमि। स मा रक्षतु स मा गोपायतु तस्मा आत्मानं परि ददे स्वाह ॥

अग्निः। मा। पातु। वसुऽभिः। पुरस्तात्। तस्मिन्। क्रमे। तस्मिन्। श्रये। ताम्। पुरम्। प्र। एमि। सः। मा। रक्षतु। सः। मा। गोपायतु। तस्मै। आत्मानम्। परि। ददे। स्वाहा। १७.१॥

Meaning
१. (अग्निः) = वह अग्रणी प्रभु-हमें निरन्तर आगे और आगे ले-चलनेवाले प्रभु (मा) = मुझे (वसुभि:) = निवास के लिए सब आवश्यक तत्त्वों के साथ (पुरस्तात्) = पूर्व दिशा की ओर से (पातु) = रक्षित करें। मैं उस प्रभु को सामने स्थित अनुभव करूँ जोकि मुझे प्रेरणा देते हुए आगे ले-चले रहे हैं और निवास के लिए आवश्यक सब तत्त्वों को प्राप्त करा रहे हैं। २. (तस्मिन् क्रमे) = उस प्रभु में स्थित होता हुआ मैं गतिशील होता हूँ। तस्मिन् श्रये उसी में आश्रय करता हूँ और इसप्रकार (तां पुरं प्रैमि) = उस ब्रह्मनगरी की ओर [प्र] निरन्तर बढ़ता हूँ। (स:) = वह प्रभु (मा रक्षतु) = मुझे रोगों से बचाए। (स:) = वे प्रभु (मा) = मुझे (गोपायतु) = मन में वासनाओं के आक्रमण से सुरक्षित करे । (तस्मा) = उस प्रभु के लिए (आत्मानं परिददे) = अपने को दे डालता हूँ। (स्वाहा) = [स्व आ हा] अपने को सर्वथा उस प्रभु में त्याग देता हूँ। प्रभु में अपने को समर्पित कर देता हूँ।
Essence
मैं पूर्व दिशा में उस अग्रणी प्रभु को स्थित अनुभव करूँ, जोकि मुझे निवास के लिए सब आवश्यक तत्त्वों को प्राप्त करा रहे हैं। इस प्रभु की ओर ही, कर्त्तव्यकों के करने के द्वारा बढ़ चलूँ। ब्रह्मपुरी में पहुँचने को अपना लक्ष्य बनाऊँ। प्रभु के प्रति अपने को दे डालूँ। प्रभु में प्रवेश कर जाऊँ, उनकी गोद में पहुँच जाऊँ।
Subject
'अग्नि' वसुओं के साथ पूर्व में

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