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Atharvaveda - Mantra 3

Atharvaveda 19/15/3

72 Sukta
6 Mantra
19/15/3
Devata- इन्द्रः Rishi- अथर्वा Chhanda- विराट्पथ्यापङ्क्तिः Suktam- अभय सूक्त
Mantra with Swara
इन्द्र॑स्त्रा॒तोत वृ॑त्र॒हा प॑र॒स्फानो॒ वरे॑ण्यः। स र॑क्षि॒ता च॑रम॒तः स म॑ध्य॒तः स प॒श्चात्स पु॒रस्ता॑न्नो अस्तु ॥

इन्द्रः॑। त्रा॒ता। उ॒त। वृ॒त्र॒ऽहा। प॒र॒स्फानः॑। वरे॑ण्यः। सः। र॒क्षि॒ता। च॒र॒म॒तः। सः। म॒ध्य॒तः। सः। प॒श्चात्। सः। पु॒रस्ता॑त्। नः॒। अ॒स्तु॒ ॥१५.३॥

Mantra without Swara
इन्द्रस्त्रातोत वृत्रहा परस्फानो वरेण्यः। स रक्षिता चरमतः स मध्यतः स पश्चात्स पुरस्तान्नो अस्तु ॥

इन्द्रः। त्राता। उत। वृत्रऽहा। परस्फानः। वरेण्यः। सः। रक्षिता। चरमतः। सः। मध्यतः। सः। पश्चात्। सः। पुरस्तात्। नः। अस्तु ॥१५.३॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (इन्द्रः) = वह शत्रुविद्रावक, सर्वशक्तिमान् प्रभु (त्राता) = हम सबका रक्षक है-प्रभु ही हमें रोगों के आक्रमण से बचाते हैं उत और प्रभु ही (वृत्रहा) = ज्ञान पर आवरण के रूप में आ जानेवाली वासनाओं को नष्ट करते हैं। इसप्रकार वे प्रभु (परस्फान:) = अत्यन्त उत्कृष्ट [पर] वृद्धि को करनेवाले हैं [स्फायी वृद्धी], (वरेण्यः) = अतएव वरण के योग्य हैं। २. (स:) = वे प्रभु (चरमत:) = अन्त से (रक्षिता) = हमारा रक्षण करनेवाले हैं। (सः) = वे प्रभु ही (मध्यत:) = मध्य से रक्षण करनेवाले हैं और (स:) = वे प्रभु (पश्चात्) = पीछे से व (स:) = वे प्रभु ही (पुरस्तात्) = आगे से (न:) = हमारे [रक्षिता] अस्तु रक्षक हों।
Essence
प्रभु अपने आराधकों को रोगों से बचाते हैं, उनकी वासनाओं का विनाश करते हैं। इसप्रकार उनका वर्धन करते हैं, अतएव वे प्रभु 'वरेण्य हैं। वे प्रभु हमारे सर्वत: रक्षक हों।
Subject
त्राता-वृत्रहा