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Atharvaveda - Mantra 5

Atharvaveda 19/13/5

72 Sukta
11 Mantra
19/13/5
Devata- इन्द्रः Rishi- अप्रतिरथः Chhanda- भुरिक्त्रिष्टुप् Suktam- एकवीर सूक्त
Mantra with Swara
ब॑लविज्ञा॒यः स्थवि॑रः॒ प्रवी॑रः॒ सह॑स्वान्वा॒जी सह॑मान उ॒ग्रः। अ॒भिवी॑रो अ॒भिष॑त्वा सहो॒जिज्जैत्र॑मिन्द्र॒ रथ॒मा ति॑ष्ठ गो॒विद॑म् ॥

ब॒ल॒ऽवि॒ज्ञा॒यः। स्थवि॑रः। प्रऽवी॑रः। सह॑स्वान्। वा॒जी। सह॑मानः। उ॒ग्रः। अ॒भिऽवी॑रः। अ॒भिऽस॑त्वा। स॒हः॒ऽजित्। जैत्र॑म्। इ॒न्द्र॒। रथ॑म्। आ। ति॒ष्ठ॒। गो॒ऽविद॑न् ॥१३.५॥

Mantra without Swara
बलविज्ञायः स्थविरः प्रवीरः सहस्वान्वाजी सहमान उग्रः। अभिवीरो अभिषत्वा सहोजिज्जैत्रमिन्द्र रथमा तिष्ठ गोविदम् ॥

बलऽविज्ञायः। स्थविरः। प्रऽवीरः। सहस्वान्। वाजी। सहमानः। उग्रः। अभिऽवीरः। अभिऽसत्वा। सहःऽजित्। जैत्रम्। इन्द्र। रथम्। आ। तिष्ठ। गोऽविदन् ॥१३.५॥

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Meaning
१. गतमन्त्र का उपासक (बलविज्ञायः) = बल के कारण प्रसिद्ध होता है [Known for his vigour] (गोविदन्) = वेदवाणियों का ज्ञाता बनकर (जैत्रं रथम् आतिष्ठ) = विजयशील शरीर-रथ पर आसीन हो। तुझमें बल व ज्ञान का समन्वय हो-यह समन्वय तुझे विजयी बनाए। (अभिवीरः अभिषत्वा) [सत्वा] = तू वीरता की ओर चलनेवाला हो और सत्त्वगुण की ओर चलनेवाला हो ज्ञान की ओर । तूने वीरता व ज्ञान दोनों को अपनाना है। २. (स्थविर:) = स्थिरमति का बनना है और (प्रवीरः) = खूब वीर बनना है। (सहस्वान्) = ज्ञानी बनकर सहनशक्तिवाला [Toleration] बनना है और (वाजी) = शक्तिशाली होना है। (सहमान:) = ज्ञान के द्वारा सहनशक्तिवाला व (उग्र:) = तेजस्वी बनना है। संक्षेप में (सहोजित्) = तूने सहस् के द्वारा शत्रुओं का विजेता होना है।
Essence
हम अपने जीवनों में बल व ज्ञान का समन्वय करते हुए सदा विजयी बनें।
Subject
जैत्ररथ का आरोहण