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Atharvaveda - Mantra 3

Atharvaveda 19/13/3

72 Sukta
11 Mantra
19/13/3
Devata- इन्द्रः Rishi- अप्रतिरथः Chhanda- भुरिक्त्रिष्टुप् Suktam- एकवीर सूक्त
Mantra with Swara
सं॒क्रन्द॑नेनानिमि॒षेण॑ जि॒ष्णुना॑ऽयो॒ध्येन॑ दुश्च्यव॒नेन॑ धृ॒ष्णुना॑। तदिन्द्रे॑ण जयत॒ तत्स॑हध्वं॒ युधो॑ नर॒ इषु॑हस्तेन॒ वृष्णा॑ ॥

स॒म्ऽक्रन्द॑नेन। अ॒नि॒ऽमि॒षेण॑। जि॒ष्णुना॑। अ॒यो॒ध्येन॑। दुः॒ऽच्य॒व॒नेन॑। धृ॒ष्णुना॑। तत्। इन्द्रे॑ण। ज॒य॒त॒। तत्। स॒ह॒ध्व॒म्। युधः॑। न॒रः॒। इषु॑ऽहस्तेन। वृष्णा॑ ॥१३.३॥

Mantra without Swara
संक्रन्दनेनानिमिषेण जिष्णुनाऽयोध्येन दुश्च्यवनेन धृष्णुना। तदिन्द्रेण जयत तत्सहध्वं युधो नर इषुहस्तेन वृष्णा ॥

सम्ऽक्रन्दनेन। अनिऽमिषेण। जिष्णुना। अयोध्येन। दुःऽच्यवनेन। धृष्णुना। तत्। इन्द्रेण। जयत। तत्। सहध्वम्। युधः। नरः। इषुऽहस्तेन। वृष्णा ॥१३.३॥

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Meaning
१. हे (युधः) = काम-क्रोध आदि से युद्ध करनेवाले (नर:) = अपने को उन्नति-पथ पर ले चलनेवाले मनुष्यो! (इन्द्रेण) = शत्रुओं का विद्रावण करनेवाली आत्मा से (तत्) = इस शत्रु-सैन्य को जयत-जीतनेवाले बनो। (तत्) = उस शत्रुसैन्य को (सहध्वम्) = कुचल डालो। २. कैसे इन्द्र से? (संक्रन्दनेन) = प्रभु का आह्वान करनेवाले, (अनिमिषेण) = कभी पलक न मारनेवाले-सदा जागरित, अप्रमत्त आत्मा से, (जिष्णुना) = सदा विजयशील से, (अयोध्येन) = जिससे युद्ध करना कठिन है उस आत्मा से (दुश्च्यवनेन) = युद्ध से पराङ्मुख न किये जानेवाले से, धृष्णुना शत्रुओं का धर्षण करनेवाले से, (इषुहस्तेन) = [इष् प्रेरणे] प्रभु-प्रेरणा को जिसने हाथों में लिया हुआ है-प्रभु-प्रेरणा के अनुसार जो कार्य कर रहा है, उससे, वृष्णा-शक्तिशाली से, ऐसी आत्मा के द्वारा तुम शत्रु सैन्य का विजय करो।
Essence
हम प्रभु का आह्वान करते हुए प्रभु-प्रेरणा के अनुसार कार्य करते हुए शक्तिशाली बनें और वासना-संग्राम में विजयी बनें।
Subject
अनिमिष