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Atharvaveda - Mantra 4

Atharvaveda 19/10/4

72 Sukta
10 Mantra
19/10/4
Devata- मन्त्रोक्ताः Rishi- ब्रह्मा Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- शान्ति सूक्त
Mantra with Swara
शं नो॑ अ॒ग्निर्ज्योति॑रनीको अस्तु॒ शं नो॑ मि॒त्रावरु॑णाव॒श्विना॒ शम्। शं नः॑ सु॒कृतां॑ सुकृ॒तानि॑ सन्तु॒ शं न॑ इषि॒रो अ॒भि वा॑तु॒ वातः॑ ॥

शम्। नः॒। अ॒ग्निः। ज्योतिः॑ऽअनीकः। अ॒स्तु॒। शम्। नः॒। मि॒त्रावरु॑णौ। अ॒श्विना॑। शम्। शम्। नः॒। सु॒ऽकृता॑म्। सु॒ऽकृ॒तानि॑। स॒न्तु॒ । शम्। नः॒। इ॒षि॒रः। अ॒भि। वा॒तु॒। वातः॑ ॥१०.४॥

Mantra without Swara
शं नो अग्निर्ज्योतिरनीको अस्तु शं नो मित्रावरुणावश्विना शम्। शं नः सुकृतां सुकृतानि सन्तु शं न इषिरो अभि वातु वातः ॥

शम्। नः। अग्निः। ज्योतिःऽअनीकः। अस्तु। शम्। नः। मित्रावरुणौ। अश्विना। शम्। शम्। नः। सुऽकृताम्। सुऽकृतानि। सन्तु । शम्। नः। इषिरः। अभि। वातु। वातः ॥१०.४॥

Meaning
१. (ज्योतिरनीक:) = [अनीकम् face] ज्योतिर्मय मुखबाला-जिसके मुख से ज्ञान की ही वाणियों का उच्चारण होता है-यह ब्राह्मण (नः शं अस्तु) = हमारे लिए शान्ति करनेवाला हो। (मित्रावरुणौ) = स्नेह व द्वेष-निवारण [निषता] की भावनाएँ (नः शम्) = हमारे लिए शान्तिकर हों। (अश्विना) = प्राणापान शक्ति (शम्) = हमें शान्ति दे। २. (सुकृताम्) = पुण्यशालियों के (सुकृतानि) = पुण्यकर्म (न:) = हमारे लिए (शम्) = शान्तिकर (सन्तु) = हों और यह (इषिरः) = गतिशील (वातः) = वायु (न:) = हमारे लिए भी गति की प्रेरणा देता हुआ (शम् अभिवातु) = शान्तिकर होकर चारों ओर बहे।
Essence
ज्ञानी ब्राह्मण ज्ञान देते हुए हमें शान्ति प्रास कराएँ। स्नेह व निद्रेषता का भाव तथा प्राणापानशक्ति हमें शान्ति दे। पुण्यकर्मा लोगों के पुण्यकर्म हमें शान्ति प्रास कराएँ और यह निरन्तर गतिशील वायु गति की प्रेरणा देता हुआ हमें शान्ति प्राप्त कराए।
Subject
'ज्योतिरनीक' अग्नि

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