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Atharvaveda - Mantra 3

Atharvaveda 19/10/3

72 Sukta
10 Mantra
19/10/3
Devata- मन्त्रोक्ताः Rishi- ब्रह्मा Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- शान्ति सूक्त
Mantra with Swara
शं नो॑ धा॒ता शमु॑ ध॒र्ता नो॑ अस्तु॒ शं न॑ उरू॒ची भ॑वतु स्व॒धाभिः॑। शं रोद॑सी बृह॒ती शं नो॒ अद्रिः॒ शं नो॑ दे॒वानां॑ सु॒हवा॑नि सन्तु ॥

शम्। नः॒। धा॒ता। शम्। ऊं॒ इति॑। ध॒र्ता। नः॒। अ॒स्तु॒। शम्। नः॒। उ॒रू॒ची। भ॒व॒तु॒। स्व॒धाभिः॑। शम्। रोद॑सी॒ इति॑। बृ॒ह॒ती॒ इति॑। शम्। नः॒। अद्रिः॑। शम्। नः॒। दे॒वाना॑म्। सु॒ऽहवा॑नि। स॒न्तु॒ ॥१०.३॥

Mantra without Swara
शं नो धाता शमु धर्ता नो अस्तु शं न उरूची भवतु स्वधाभिः। शं रोदसी बृहती शं नो अद्रिः शं नो देवानां सुहवानि सन्तु ॥

शम्। नः। धाता। शम्। ऊं इति। धर्ता। नः। अस्तु। शम्। नः। उरूची। भवतु। स्वधाभिः। शम्। रोदसी इति। बृहती इति। शम्। नः। अद्रिः। शम्। नः। देवानाम्। सुऽहवानि। सन्तु ॥१०.३॥

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Meaning
१. (न:) = हमारे लिए (धाता) = सब लोक-लोकान्तरों का धारण करनेवाला प्रभु (शम्) = शान्ति दे (उ) = और (धर्ता) = सब प्राणियों का धारण करनेवाला [आश्रयदाता] प्रभु (शं अस्तु) = शान्ति देनेवाला हो।(न:) = हमारे लिए यह (उरूची) = [उरु अब्बति] सुदुर प्रदेश तक फैली हुई पृथिवी (स्वधाभिः) = अन्नों के द्वारा (शम्) = शान्ति करनेवाली (भवतु) = हो। २. (बृहती) = विशाल (रोदसी) = द्यावापृथिवी (शम्) = शान्तिकर हों। (न:) = हमारे लिए (अद्रिः) = पर्वत व मेघ (शम्) = शान्ति दें। (न:) = हमारे लिए (देवानाम्) = दिव्यवृत्तिवाले ज्ञानी पुरुषों के (सुहवानि) = उत्तम आह्वान (शं सन्तु) = शान्तिकर हों। हम घरों में समय-समय पर ज्ञानी विद्वानों को आमन्त्रित करें और उनसे ज्ञानोपदेश सुनकर उत्तम मार्ग पर चलनेवाले बनें।
Essence
ब्रह्माण्ड व सब प्राणियों का धारण करनेवाले प्रभु हमें शान्ति प्राप्त कराएँ। यह पृथिवी उत्तम अन्नों को देकर हमें सुखी व शान्त करे। द्युलोक व पृथिवीलोक हमें शान्ति देनेवाले हों, पर्वत व मेघ हमारे लिए सुखकर हों। हम सदा ज्ञानियों के सम्पर्क में ज्ञानोपदेश प्राप्त करके जीवन में उत्तम मार्ग पर चलते हुए शान्त जीवनवाले हों।
Subject
धाता-धर्ता