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Atharvaveda - Mantra 89

Atharvaveda 18/4/89

4 Sukta
89 Mantra
18/4/89
Devata- पञ्चपदा पथ्यापङ्क्ति Rishi- चन्द्रमा Chhanda- अथर्वा Suktam- पितृमेध सूक्त
Mantra with Swara
च॒न्द्रमा॑अ॒प्स्वन्तरा सु॑प॒र्णो धा॑वते दि॒वि। न वो॑ हिरण्यनेमयः प॒दं वि॑न्दन्तिविद्युतो वि॒त्तं मे॑ अ॒स्य रो॑दसी ॥

च॒न्द्रमा॑: । अ॒प्ऽसु । अ॒न्त:। आ । सु॒ऽप॒र्ण: । धा॒व॒ते॒ । दि॒वि । न । व॒:। हि॒र॒ण्य॒ऽने॒म॒य॒: । प॒दम् । वि॒न्द॒न्ति॒ । वि॒ऽद्यु॒त॒: । वि॒त्तम् । मे॒ । अ॒स्य॒ । रो॒द॒सी॒ इति॑ ॥४.८९॥

Mantra without Swara
चन्द्रमाअप्स्वन्तरा सुपर्णो धावते दिवि। न वो हिरण्यनेमयः पदं विन्दन्तिविद्युतो वित्तं मे अस्य रोदसी ॥

चन्द्रमा: । अप्ऽसु । अन्त:। आ । सुऽपर्ण: । धावते । दिवि । न । व:। हिरण्यऽनेमय: । पदम् । विन्दन्ति । विऽद्युत: । वित्तम् । मे । अस्य । रोदसी इति ॥४.८९॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (चन्द्रमा) = गतमन्त्र के अनुसार प्रभु की प्रेरणा को सुननेवाला व्यक्ति अंहकारशून्य मनोवृत्तिवाला होता है, (अप्सु अन्त:) = वह सदा कर्मों में व्याप्त रहता-कर्मशील होता है। (सुपर्ण:) = उत्तम पालनात्मक व पूरणात्मक कर्मों में प्रवृत्त यह व्यक्ति (दिवि) = ज्ञान के प्रकाश में (आधावते) = अपने को सर्वथा शुद्ध करता है। २. प्रभु कहते हैं कि (रोदसी) = सारे द्यावापृथिवी में रहनेवाले मनुष्य में (अस्य वित्तम्) = मेरी इस बात को समझलें कि वः तुममें से (हिरण्यनेमय:) = हिरण्य [सोना] ही जिनकी नेमि [परिधि] है, वे धनासक्त लोग (विद्युतः पदं न विन्दन्ति) = उस विशिष्ट दीप्तिवाले ज्योतिर्मय प्रभु को नहीं प्राप्त करते। धनासक्ति से ऊपर उठकर ही प्रभु की प्राप्ति संभव होती है।
Essence
हम आहादमय मनोवृत्ति से कर्तव्य-कर्मों को करते रहें-ज्ञान में अपने को पवित्र करने का प्रयत्न करे। धनासक्ति से ऊपर उठकर प्रभु-प्राप्ति के लिए यत्नशील हों।
Subject
'चन्द्रमा+सुपर्ण, नकि हिरण्यनेमि'