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Atharvaveda - Mantra 88

Atharvaveda 18/4/88

4 Sukta
89 Mantra
18/4/88
Devata- त्र्यवसाना पथ्यापङ्क्ति Rishi- अग्नि Chhanda- अथर्वा Suktam- पितृमेध सूक्त
Mantra with Swara
आ त्वा॑ग्नइधीमहि द्यु॒मन्तं॑ देवा॒जर॑म्। यद्घ॒ सा ते॒ पनी॑यसी स॒मिद्दी॒दय॑ति॒ द्यवि॑।इषं॑ स्तो॒तृभ्य॒ आ भ॑र ॥

आ । त्वा॒ । अ॒ग्ने॒ । इ॒धी॒म॒हि॒ । द्यु॒ऽमन्त॑म् । दे॒व॒ । अ॒जर॑म् । यत् । घ॒ । सा । ते॒ । पनी॑यसी । स॒म्ऽइत् । दी॒दय॑ति । द्यवि॑ । इष॑म् । स्तो॒तृऽभ्य॑: । आ । भ॒र॒ ॥ ४.८८॥

Mantra without Swara
आ त्वाग्नइधीमहि द्युमन्तं देवाजरम्। यद्घ सा ते पनीयसी समिद्दीदयति द्यवि।इषं स्तोतृभ्य आ भर ॥

आ । त्वा । अग्ने । इधीमहि । द्युऽमन्तम् । देव । अजरम् । यत् । घ । सा । ते । पनीयसी । सम्ऽइत् । दीदयति । द्यवि । इषम् । स्तोतृऽभ्य: । आ । भर ॥ ४.८८॥

Meaning
१. हे (अग्ने) = अग्रणी प्रभो! (त्वा आइधीमहि) = आपको हम अपने में सर्वथा दीत करते है आपके प्रकाश को हृदयों में देखने के लिए यत्नशील होते हैं। आप हे (देव) = प्रकाशमय प्रभो! (द्युमन्तम्) = ज्योतिर्मय हैं, (अजरम्) = अजीर्ण शक्तिवाले हैं-आप ज्योति व शक्ति के पुञ्ज हैं। २. (यत्) = जो (घा) = निश्चय से (सः) = वह (ते) = आपकी (समित्) = दीप्ति है, वह (पनीयसी) = अतिशयेन स्तुत्य है। (द्यवि दीदयति) = आपकी दीप्ति सम्पूर्ण धुलोक में दीप्त है-हमारे मस्तिष्करूप द्युलोकों को भी वह दीप्त करती है। हे प्रभो! (स्तोतृभ्यः) = हम स्तोताओं के लिए (इषं आभर) = प्रेरणा प्राप्त कराइए। आपसे प्रेरणा प्राप्त करते हुए हम उत्कृष्ट जीवनवाले हों।
Essence
हम हृदयों में प्रभु को समिद्ध करें। प्रभु की प्रशस्त दीप्ति हमारे मस्तिष्क को उञ्चल करे। हम प्रभु से प्रेरणा प्राप्त करें। सच्चे स्तोता बनकर ही तो हम इसे प्राप्त करेंगे।
Subject
'द्युमान् अजर' देव की दीप्ति का दर्शन

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