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Atharvaveda - Mantra 86

Atharvaveda 18/4/86

4 Sukta
89 Mantra
18/4/86
Devata- चतुष्पदा ककुम्मती उष्णिक् Rishi- पितरगण Chhanda- अथर्वा Suktam- पितृमेध सूक्त
Mantra with Swara
येऽत्र॑ पि॒तरः॑पि॒तरो॒ येऽत्र॑ यू॒यं स्थ यु॒ष्मांस्तेऽनु॑ यू॒यं तेषां॒ श्रेष्ठा॑ भूयास्थ॥

ये । अत्र॑ । पि॒तर॑: । पि॒तर॑: । ये । अत्र॑ । यू॒यम् । स्थ । यु॒ष्मान् । ते । अनु॑ । यू॒यम् । तेषा॑म् । श्रेष्ठा॑: । भू॒या॒स्थ॒ ॥४.८६॥

Mantra without Swara
येऽत्र पितरःपितरो येऽत्र यूयं स्थ युष्मांस्तेऽनु यूयं तेषां श्रेष्ठा भूयास्थ॥

ये । अत्र । पितर: । पितर: । ये । अत्र । यूयम् । स्थ । युष्मान् । ते । अनु । यूयम् । तेषाम् । श्रेष्ठा: । भूयास्थ ॥४.८६॥

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Meaning
१. (ये) = जो (अत्र) = यहाँ (पितरः) = पितर हैं, (ये यूयम्) = जो आप (अत्र) = यहाँ (पितरः स्थ) = पालनात्मक कर्मों में प्रवृत्त हो, जो (युष्मान् अनु) = आपका अनुसरण करनेवाले हैं। (यूयम्) = आप (तेषाम्) = उन सब पितरों में (श्रेष्ठाः भूयास्थ) = श्रेष्ठ हैं, अर्थात् पितरों में वे पितर जो साधना करके पालनात्मक कार्यों में प्रवृत्त हैं, वे श्रेष्ठ हैं। २. (ये) = जो (इह) = यहाँ (पितर:) = पितर (जीवा:) = जीवनशक्ति से परिपूर्ण हैं। (इह) = यहाँ उनके समीप (वयं स्म:) = हम होते हैं। (ते) = वे सब पितर (अस्मान् अनु) = हमें अनुकूलता से प्राप्त होते हैं। (वयम्) = हम (तेषाम्) = उनके ही बन जाते हैं उनके प्रति अपना अर्पण करते हैं और इसप्रकार हम (श्रेष्ठाः भूयास्म) = श्रेष्ठ हों।
Essence
पितर सचमुच पितर हों-पालनात्मक कर्मों में प्रवृत्त हों। हम उनके समीप रहकर श्रेष्ठ जीवनवाले बनें।
Subject
पितर पितर हों, हम श्रेष्ठ बनें