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Atharvaveda - Mantra 8

Atharvaveda 18/4/8

4 Sukta
89 Mantra
18/4/8
Devata- त्रिष्टुप् Rishi- यम, मन्त्रोक्त Chhanda- अथर्वा Suktam- पितृमेध सूक्त
Mantra with Swara
अङ्गि॑रसा॒मय॑नं॒पूर्वो॑ अ॒ग्निरा॑दि॒त्याना॒मय॑नं॒ गार्ह॑पत्यो॒ दक्षि॑णाना॒मय॑नं दक्षिणा॒ग्निः। म॑हि॒मान॑म॒ग्नेर्विहि॑तस्य॒ ब्रह्म॑णा॒ सम॑ङ्गः॒ सर्व॒ उप॑ याहि श॒ग्मः॥

अङ्ग‍ि॑रसाम् । अय॑नम् । पूर्व॑: । अ॒ग्नि । आ॒दि॒त्याना॑म् । अय॑नम् । गार्ह॑ऽपत्य । दक्षि॑णानाम् । अय॑नम् । द॒क्षि॒ण॒ऽअ॒ग्नि: । म॒हि॒मान॑म् । अ॒ग्ने: । विऽहि॑तस्य । ब्रह्म॑णा । सम्ऽअ॑ङ्ग: । सर्व॑: । उप॑ । या॒हि॒ । श॒ग्म: ॥४.८॥

Mantra without Swara
अङ्गिरसामयनंपूर्वो अग्निरादित्यानामयनं गार्हपत्यो दक्षिणानामयनं दक्षिणाग्निः। महिमानमग्नेर्विहितस्य ब्रह्मणा समङ्गः सर्व उप याहि शग्मः॥

अङ्ग‍िरसाम् । अयनम् । पूर्व: । अग्नि । आदित्यानाम् । अयनम् । गार्हऽपत्य । दक्षिणानाम् । अयनम् । दक्षिणऽअग्नि: । महिमानम् । अग्ने: । विऽहितस्य । ब्रह्मणा । सम्ऽअङ्ग: । सर्व: । उप । याहि । शग्म: ॥४.८॥

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Meaning
१. (अङ्गिरसाम्) = प्राणशक्तिसम्पन्न-अथवा प्राणों की आराधना करनेवाले ब्रह्मचारियों का (अयनम्) = शरण [रक्षक] (पूर्वः अग्नि:) = यह आहवनीय अग्नि है। आहवनीय अग्नि 'आचार्य' है [गुरुराहवनीयस्तु]। यह विद्यार्थी का पूरण करने से 'पूर्व अग्नि' कहा गया है। यह विद्यार्थी को संयमी बनाकर प्राणशक्तिसम्पन्न बनाता है। (आदित्यानाम्) = अदीना देवमाता के पुत्रभूत इन गृहस्थों का (अयनम्) = शरण (गार्हपत्यः) = गार्हपत्य अग्नि है। गार्हपत्य अग्नि ठीक प्रज्वलित रहे, अर्थात् गृहस्थ का खान-पान ठीक से चलता जाए तो गृहस्थ में सबके मस्तिष्क ठीक से कार्य करते हैं। गार्हपत्य अग्नि 'पिता' कहलाता है। पिता के ठीक होने पर गृहस्थ में अन्य व्यक्ति भी ठीक बने रहते हैं। सन्तानों पर पिता का बड़ा स्वस्थ प्रभाव पड़ना आवश्यक है। अब गृहस्थ से ऊपर उठकर [दक्ष to grow] वानप्रस्थ में पहुँचनेवाले (दक्षिणानाम्) = चतुर, कुशल पुरुषों का (अयनम्) = शरण (दक्षिणाग्नि:) = दक्षिणाग्नि 'माता' है। एक वानप्रस्थ अब किन्हीं को भी पत्नीभाव से न देखकर सभी को मातृभाव से देखता है। २. संन्यस्त होकर तू ब्रह्मणा विहितस्य वेद द्वारा प्रतिपादित (अग्नेः महिमानम्) = उस प्रभु की महिमा को [सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति] समङ्गः सब अंगों से संगत हुआ-हुआ सर्ब:-[whole] पूर्णस्वस्थ व (शग्मः) = सुख-दुःखरहित हुआ-हुआ (उपयाहि) = समीपता से प्राप्त हो। प्रभु की उपासना करता हुआ तू प्रभु की महिमा को प्राप्त करनेवाला हो।
Essence
आचार्य हमें प्राणशक्तिसम्पन्न बनाएँ। गृहस्थ में पिता सबको उत्तम गुणों का आदान करनेवाला बनाए। वानप्रस्थ में हम सब नारियों में मातृभावनावाले हों और अन्ततः संन्यास में हम संहत अवयवोंवाले-स्वस्थ व सुखी होते हुए प्रभु की महिमा को प्राप्त करें।
Subject
अङ्गिरस-आदित्य-दक्षिण