Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Atharvaveda - Mantra 76

Atharvaveda 18/4/76

4 Sukta
89 Mantra
18/4/76
Devata- आसुरी गायत्री Rishi- यम, मन्त्रोक्त Chhanda- अथर्वा Suktam- पितृमेध सूक्त
Mantra with Swara
ए॒तत्ते॑ ततामहस्व॒धा ये च॒ त्वामनु॑ ॥

ए॒तत् । ते॒ । त॒ता॒म॒ह॒ । स्व॒धा । ये । च॒ । त्वाम् । अनु॑ ॥४.७६॥

Mantra without Swara
एतत्ते ततामहस्वधा ये च त्वामनु ॥

एतत् । ते । ततामह । स्वधा । ये । च । त्वाम् । अनु ॥४.७६॥

Meaning
१. एक गृहस्थ युवक के परदादा आज से ५० वर्ष पूर्व वानप्रस्थ बने थे, इसी प्रकार इसके दादा २५ वर्ष पूर्व वनस्थ हुए थे। वहाँ वनों में कितने ही अन्य अपने समान वनस्थों के साथ उनका उठना-बैठना व परिचय हो गया था। आज वे अपने घर में आते हैं तो उनके साथियों के आने का भी सम्भव हो ही सकता है। इसके पिता तो अभी समीप भूत में ही वनस्थ हुए हैं। वे अभी इतने परिचित नहीं बना पाये। वे अभी अकेले ही आये हैं। २. इन सबके आने पर यह गृहस्थ उन्हें आदरपूर्वक कहता है कि हे (प्रततामह) = परदादाजी! (एतत्) = यह (ते) = आपके लिए (स्वधा) = अन्न है। च-और उनके लिए भी (स्वधा) = अन्न है, (ये) = जो (त्वाम् अनु) = आपके साथ आये हैं। ३. इसी प्रकार वह दादाजी के लिए भी कहता है कि हे (ततामह) = दादाजी! (एतत्) = यह ते आपके लिए (स्वधा) = अन्न है (च) = और (ये) = जो (त्वाम् अनु) = आपके साथ आये हैं, परन्तु पिताजी के लिए वह इतना ही कहता है कि हे (तत) = पितः। (एतत्) = यह (ते) = आपके लिए (स्वधा) = अन्न है।
Essence
हम घर पर पधारे हुए वनस्थ परदादा, दादा व पिताजी के लिए उचित भोजन का परिवेषण करें।
Subject
परदादा, दादा व पिता

We are thankful to https://vedicscriptures.in for providing us a substantial amount of data for this section of the Vedas.