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Atharvaveda - Mantra 7

Atharvaveda 18/4/7

4 Sukta
89 Mantra
18/4/7
Devata- भुरिक् त्रिष्टुप् Rishi- यम, मन्त्रोक्त Chhanda- अथर्वा Suktam- पितृमेध सूक्त
Mantra with Swara
ती॒र्थैस्त॑रन्तिप्र॒वतो॑ म॒हीरिति॑ यज्ञ॒कृतः॑ सु॒कृतो॒ येन॒ यन्ति॑। अत्रा॑दधु॒र्यज॑मानायलो॒कं दिशो॑ भू॒तानि॒ यदक॑ल्पयन्त ॥

ती॒र्थै: । त॒र॒न्ति॒ । प्र॒ऽवत॑: । म॒ही: । इति॑ । य॒ज्ञ॒ऽकृत॑: । सु॒ऽकृत॑: । येन॑ । यन्ति॑ । अत्र॑ । अ॒द॒धु॒: । यज॑मानाय । लो॒कम् । दिश॑: । भू॒तानि॑ । यत् । अक॑ल्पयन्त ॥४.७॥

Mantra without Swara
तीर्थैस्तरन्तिप्रवतो महीरिति यज्ञकृतः सुकृतो येन यन्ति। अत्रादधुर्यजमानायलोकं दिशो भूतानि यदकल्पयन्त ॥

तीर्थै: । तरन्ति । प्रऽवत: । मही: । इति । यज्ञऽकृत: । सुऽकृत: । येन । यन्ति । अत्र । अदधु: । यजमानाय । लोकम् । दिश: । भूतानि । यत् । अकल्पयन्त ॥४.७॥

Meaning
१. (तीर्थै:) = माता, पिता, आचार्य आदि तीर्थों के द्वारा (मही:) = महान् (प्रवतः) = [Precipice, deciving] ढलानों को (तरन्ति) = तैर जाते हैं, अर्थात् अज्ञानान्धकार से तरानेवाले 'माता, पिता, आचार्य' आदि तीर्थ हैं। इनके द्वारा दिये गये ज्ञानों के द्वारा हम जीवन-यात्रा में आ जानेवाली महान् ढलानों को-कठिन मार्गों को जीवन की उलझनों को तैर जाते हैं। (इति) = इसप्रकार अज्ञानान्धकारों को तैर कर ये उस मार्ग से (यन्ति) = चलते हैं, (येन) = जिससे कि (यज्ञकृत: सकृत:) = यज्ञशील पुण्यकृत् लोग चला करते हैं। ब्रह्मचर्याश्रम में अज्ञान को दूर करके गृहस्थ में यज्ञशील बनते हैं। २. इस (यजमानाय) = यज्ञशील पुरुष के लिए अन्न-यहाँ-गृहस्थ जीवन में (दिश:) = सब दिशाएँ (लोकम् अदधुः) = प्रकाश को धारण करती हैं। (यत्) = जबकि ये यज्ञशील (भूतानि) = सब प्राणियों को (अकल्पयन्त) = सामर्थ्य-सम्पन्न करते हैं। यज्ञ की भावना मनुष्यों को परस्पर मेलवाला बनाती है। [यज्ञ संगतिकरणे]। यह मेल उनकी शक्ति को बढ़ाता है। इस शक्ति के होने पर उनके लिए सब ओर प्रकाश-ही-प्रकाश होता है। निर्बलता व असामर्थ्य ही सब कष्टों का मूल बना करती है।
Essence
हम 'माता, पिता, आचार्य' आदि तीर्थों से अज्ञान को तैर कर यज्ञशील बनें। इस यज्ञशीलता से हमारे लिए सब ओर प्रकाश-ही-प्रकाश होता है। इस यज्ञशीलता से हम मेलवाले बनकर शक्तिशाली बनते हैं।
Subject
तीर्थै तरन्ति प्रवतः मही [इति]

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