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Atharvaveda - Mantra 66

Atharvaveda 18/4/66

4 Sukta
89 Mantra
18/4/66
Devata- त्रिपदा स्वराट् गायत्री Rishi- यम, मन्त्रोक्त Chhanda- अथर्वा Suktam- पितृमेध सूक्त
Mantra with Swara
असौ॒ हा इ॒ह ते॒मनः॒ ककु॑त्सलमिव जा॒मयः॑। अ॒भ्येनं भूम ऊर्णुहि ॥

अ॒सौ । है । इ॒ह । ते॒ । मन॑: । ककु॑त्सलम्ऽइव । जा॒मय॑: । अ॒भि । ए॒न॒म् । भू॒मे॒ । ऊ॒र्णु॒हि॒ ॥४.६६॥

Mantra without Swara
असौ हा इह तेमनः ककुत्सलमिव जामयः। अभ्येनं भूम ऊर्णुहि ॥

असौ । है । इह । ते । मन: । ककुत्सलम्ऽइव । जामय: । अभि । एनम् । भूमे । ऊर्णुहि ॥४.६६॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. हे (असौ) = गतमन्त्र में वर्णित पितरों का आदर करनेवाले हे पुरुष! (ते मनः इह) = तेरा मन यहाँ ही हो। तू परिवार के पालन का पूर्ण ध्यान कर। २. हे (भूमे) = भूमिमाता! तू (एनम्) = इस गृहस्थ पुरुष को (अभि ऊर्णुहि) = सर्वत: आच्छादित करनेवाली हो। तेरी गोद में यह इसप्रकार सुरक्षित रहे, (इव) = जिस प्रकार (जामयः) = सन्तान को जन्म देनेवाली माताएँ (ककुत्सलम्) = [क-कु-शब्द सल गती] आनन्दप्रद [तुतलाते से] शब्दों के साथ रींगनेवाले बालक को अपनी गोद में सुरक्षित रखती हैं।
Essence
एक गृहस्थ का कर्तव्य है कि परिवार को उन्नत करने की भावना से ओतप्रोत मनवाला हो। भूमिमाता से सब आवश्यक पदार्थों को प्राप्त करने का प्रयत्न करे। भूमिमाता की गोद में अपने को उसी प्रकार सुरक्षित अनुभव करे, जैसे एक छोटा बालक माता की गोद में अपने को सुरक्षित अनुभव करता है।
Subject
भूमिमाता की गोद में