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Atharvaveda - Mantra 65

Atharvaveda 18/4/65

4 Sukta
89 Mantra
18/4/65
Devata- त्रिष्टुप् Rishi- यम, मन्त्रोक्त Chhanda- अथर्वा Suktam- पितृमेध सूक्त
Mantra with Swara
अभू॑द्दू॒तःप्रहि॑तो जा॒तवे॑दाः सा॒यं न्यह्न॑ उप॒वन्द्यो॒ नृभिः॑। प्रादाः॑ पि॒तृभ्यः॑स्व॒धया॒ ते अ॑क्षन्न॒द्धि त्वं दे॑व॒ प्रय॑ता ह॒वींषि॑ ॥

अभू॑त् । दू॒त: । प्रऽहि॑त: । जा॒तऽवे॑दा: । सा॒यम् । नि॒ऽअह्ने॑ । उ॒प॒ऽवन्द्य॑: । नृऽभि॑: । प्र । अ॒दा॒: । पि॒तृऽभ्य॑: । स्व॒धया॑ । ते । अ॒क्ष॒न् । अ॒ध्दि । त्वम् । दे॒व॒ । प्रऽय॑ता । ह॒वींषि॑ ॥४.६५॥

Mantra without Swara
अभूद्दूतःप्रहितो जातवेदाः सायं न्यह्न उपवन्द्यो नृभिः। प्रादाः पितृभ्यःस्वधया ते अक्षन्नद्धि त्वं देव प्रयता हवींषि ॥

अभूत् । दूत: । प्रऽहित: । जातऽवेदा: । सायम् । निऽअह्ने । उपऽवन्द्य: । नृऽभि: । प्र । अदा: । पितृऽभ्य: । स्वधया । ते । अक्षन् । अध्दि । त्वम् । देव । प्रऽयता । हवींषि ॥४.६५॥

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Meaning
१. वानप्रस्थाश्रम से समय-समय पर हमारे समीप प्राप्त होनेवाला यह पिता (दूतः अभूत) = प्रभु का सन्देशवाहक होता है। (प्रहित:) = यह हमारा प्रकृष्ट हित करनेवाला व (जातवेदा:) = ज्ञानी होता है। यह पिता (सायम्) = सायं और (नि अह्ने) = प्रात: (नृभिः उपबन्ध:) = गृहस्थ लोगों से वन्दनीय होता है। २. हे गृहस्थ! तू (पितृभ्यः प्रादा:) = पितरों के लिए स्वधा [अन्न] देता है। (स्वधया ते अक्षन्) = आत्मधारण के हेतु से वे इसे खाते हैं। हे (देवः) = दिव्यवृत्तिवाले पुरुष! (त्वम्) = तू भी (प्रयता हवीषि) = इन पवित्र यज्ञशिष्ट भोजनों को अद्धि-खा। पितरों को खिलाने के बाद ही खाना ठीक है।
Essence
वानप्रस्थ से आये पितर प्रभु के दूत ही होते हैं-वे हमें हितकर प्रिय ज्ञान देते हैं। हम पितरों को खिलाकर यज्ञशिष्ट पवित्र भोजनों का ही ग्रहण करें।
Subject
दूतः प्रहितः