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Atharvaveda - Mantra 63

Atharvaveda 18/4/63

4 Sukta
89 Mantra
18/4/63
Devata- स्वराट् आस्तार पङ्क्ति Rishi- यम, मन्त्रोक्त Chhanda- अथर्वा Suktam- पितृमेध सूक्त
Mantra with Swara
परा॑ यात पितरःसो॒म्यासो॑ गम्भी॒रैः प॒थिभिः॑ पू॒र्याणैः॑। अधा॑ मासि॒ पुन॒रा या॑त नोगृ॒हान्ह॒विरत्तुं॑ सुप्र॒जसः॑ सु॒वीराः॑ ॥

परा॑ । या॒त॒ । पि॒त॒र॒: । सो॒म्यास॑: । ग॒म्भी॒रै: । प॒थिऽभि॑: । पू॒:ऽयानै॑: । अध॑ । मा॒सि । पुन॑: । आ । या॒त॒ । न॒: । गृ॒हान् । ह॒वि: । अत्तु॑म् । सु॒ऽप्र॒जस॑: । सु॒ऽवीरा॑: ॥४.६३॥

Mantra without Swara
परा यात पितरःसोम्यासो गम्भीरैः पथिभिः पूर्याणैः। अधा मासि पुनरा यात नोगृहान्हविरत्तुं सुप्रजसः सुवीराः ॥

परा । यात । पितर: । सोम्यास: । गम्भीरै: । पथिऽभि: । पू:ऽयानै: । अध । मासि । पुन: । आ । यात । न: । गृहान् । हवि: । अत्तुम् । सुऽप्रजस: । सुऽवीरा: ॥४.६३॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. हे (सोम्यास:) = सोम का सम्पादन करनेवाले सौम्य स्वभाव (पितर:) = पितरो। (गम्भीरैः) = गम्भीर विचार परिपूर्ण (पर्याण:) = ब्रह्मपुरी की ओर ले-जानेवाले (पथिभिः) = मागों से (परा यात) = उत्कृष्ट मोक्षमार्ग की ओर गतिवाले होओ। आप नित्य स्वाध्याययुक्त होकर ब्रह्मदर्शन के लिए यत्नशील होओ। इसी उद्देश्य से आप गृहस्थ से ऊपर उठकर वनस्थ हुए हो। २. (अधा पुन:) = अब फिर भी (मासि) = महीने के बीतने पर (नः गृहान्) = हमारे इन घरों को ह(विः अत्तुम्) = यज्ञशिष्ट पवित्र भोजन को ग्रहण करने के लिए (आयात) = आओ, जिससे हम आपकी प्रेरणाओं के अनुसार चलते हुए (सुप्रजस:) = उत्तम प्रजावाले व (सुवीरा:) = सुवीर बन पाएँ।
Essence
सौम्य पितर ब्रह्मप्राप्ति के गम्भीर मार्ग से गमनवाले हों। वे प्रतिमास हमारे घरों पर हवि ग्रहण करने का अनुग्रह करें और हमें सत्प्रेरणाओं के द्वारा उत्तम प्रजावाले व वीर बनाएँ।
Subject
प्रतिमास [पूर्णिमा पर] पितरों का आना