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Atharvaveda - Mantra 61

Atharvaveda 18/4/61

4 Sukta
89 Mantra
18/4/61
Devata- अनुष्टुप् Rishi- यम, मन्त्रोक्त Chhanda- अथर्वा Suktam- पितृमेध सूक्त
Mantra with Swara
अक्ष॒न्नमी॑मदन्त॒ ह्यव॑ प्रि॒याँ अ॑धूषत। अस्तो॑षत॒ स्वभा॑नवो॒ विप्रा॒यवि॑ष्ठा ईमहे ॥

अक्ष॑न् । अमी॑मदन्त । हि । अव॑ । प्रि॒यान् । अ॒धू॒ष॒त॒ । अस्तो॑षत । स्वऽभा॑नव: । विप्रा॑: । यवि॑ष्ठा: । ई॒म॒हे॒ ॥४.६१॥

Mantra without Swara
अक्षन्नमीमदन्त ह्यव प्रियाँ अधूषत। अस्तोषत स्वभानवो विप्रायविष्ठा ईमहे ॥

अक्षन् । अमीमदन्त । हि । अव । प्रियान् । अधूषत । अस्तोषत । स्वऽभानव: । विप्रा: । यविष्ठा: । ईमहे ॥४.६१॥

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Meaning
१. (अक्षन्) = इन्होंने सोम का भक्षण किया है-सोम को शरीर में सुरक्षित किया है। परिणामत: (अमीमदन्त) = आनन्दित हुए हैं। सोमरक्षण से 'नीरोगता-निर्मलता व दीप्सि' की प्राप्ति होकर आनन्द का अनुभव होता है। इन्होंने (हि) = निश्चय से (प्रियान्) = प्रिय लगनेवाले संसार के भोगों को (अव अधूषत) = अपने से दूर कम्पित किया है [स त्वं प्रियान् प्रियरूपाश्च कामान् अभिध्यायन्नचिकेतो इत्यस्ताक्षीः । कठो०]। २. इसी उद्देश्य से (अस्तोषत) = इन्होंने प्रभु-स्तवन किया है। (स्वभानव:) = ये आत्मदीसिवाले बने हैं। (विप्रा:) = ये विशेषरूप से अपना पूरण करनेवाले हुए हैं। (यविष्ठा:) = बुराइयों को दूर करके अच्छाइयों को इन्होंने अपने से मिलाया है। हम इन लोगों को ही (ईमहे) = प्राप्त करने के लिए प्रार्थना करते हैं। इनके सम्पर्क में हम भी इन-जैसे बन पाएंगे।
Essence
हमें उन लोगों का सम्पर्क प्राप्त हो जो सोमरक्षण द्वारा अपने अन्दर आनन्द का अनुभव करते हैं। प्रिय लगनेवाले भोगों से भी ऊपर उठते हैं। प्रभु-स्तवन द्वारा आत्मदीसिवाले होते हैं। अपना विशेषरूप से पूरण करते हुए बुराइयों को अपने से दूर करते हैं और अच्छाइयों को अपने से मिलाते हैं।
Subject
स्वभानवः-विप्राः-यविष्ठा: