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Atharvaveda - Mantra 60

Atharvaveda 18/4/60

4 Sukta
89 Mantra
18/4/60
Devata- भुरिक् त्रिष्टुप् Rishi- यम, मन्त्रोक्त Chhanda- अथर्वा Suktam- पितृमेध सूक्त
Mantra with Swara
प्र वाए॒तीन्दु॒रिन्द्र॑स्य॒ निष्कृ॑तिं॒ सखा॒ सख्यु॒र्न प्र मि॑नाति संगि॒रः। मर्य॑इव॒ योषाः॒ सम॑र्षसे॒ सोमः॑ क॒लशे॑ श॒तया॑मना प॒था ॥

प्र । वै । ए॒ति॒ । इन्दु॑: । इन्द्र॑स्य । नि:ऽकृ॑तिम् । सखा॑ । सख्यु॑: । न । प्र । मि॒ना॒ति॒ । स॒म्ऽगि॒र: । मर्य॑:ऽइव । योषा॑: । सम् । अ॒र्ष॒से॒ । सोम॑: । क॒लशे॑ । श॒तऽया॑मना । प॒था ॥४.६०॥

Mantra without Swara
प्र वाएतीन्दुरिन्द्रस्य निष्कृतिं सखा सख्युर्न प्र मिनाति संगिरः। मर्यइव योषाः समर्षसे सोमः कलशे शतयामना पथा ॥

प्र । वै । एति । इन्दु: । इन्द्रस्य । नि:ऽकृतिम् । सखा । सख्यु: । न । प्र । मिनाति । सम्ऽगिर: । मर्य:ऽइव । योषा: । सम् । अर्षसे । सोम: । कलशे । शतऽयामना । पथा ॥४.६०॥

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Meaning
१. (इन्द्र:) = सोम [वीर्यशक्ति] (इन्द्रस्य) = जितेन्द्रिय पुरुष के (निष्कृतिम्) = संस्कृत-पवित्र हृदय की ओर (वा) = निश्चय से (प्रएति) = प्रकर्षण प्राप्त होता है। हृदय के पवित्र होने पर सोम की शरीर में ऊर्ध्वगति होती ही है। सोम का रक्षण होने पर (सखा) = प्रभु का मित्र बना हुआ वह सोमी पुरुष (सख्युः) = उस सबके सखा प्रभु के (संगिरः) = आदेशों को (न प्रमिनाति) = हिंसित नहीं करता। यह प्रभु के आदेशों का अवश्य पालन करता है। २. (इव) = जैसे (मर्य:) = एक मनुष्य (योषा:) = पत्नियों से मेलवाला होता है, उसी प्रकार यह (सोमः) = सोम भी (कलशे) = इस सोलह कलाओं के आधारभूत शरीर में (शतयामना पथा) = सौ मंजिलोंवाले [प्रयाणोंवाले] मार्ग के हेतु से, अर्थात् शतवर्षपर्यन्त चलानेवाले दीर्घजीवन के हेतु से-(समर्षसे) = प्राप्त होता है। वस्तुत: सोम एक मनुष्य का इतना प्रिय होना चाहिए जैसे पत्नी पति को प्रिय होती है।
Essence
हम हृदय को पवित्र बनाते हुए अपने शरीर में सोम का रक्षण करनेवाले बनें। यह सोमी पुरुष प्रभु के आदेशों का पालन करता है। शरीर में सुरक्षित सोम हमें सौ वर्ष का दीर्घ जीवन प्राप्त कराता है।
Subject
पवित्र हृदय व सोमरक्षण