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Atharvaveda - Mantra 59

Atharvaveda 18/4/59

4 Sukta
89 Mantra
18/4/59
Devata- अनुष्टुप् Rishi- यम, मन्त्रोक्त Chhanda- अथर्वा Suktam- पितृमेध सूक्त
Mantra with Swara
त्वे॒षस्ते॑ धू॒मऊ॑र्णोतु दि॒वि षं छु॒क्र आत॑तः। सूरो॒ न हि द्यु॒ता त्वं॑ कृ॒पा पा॑वक॒ रोच॑से॥

त्वे॒ष: । ते॒ । धू॒म: । ऊ॒र्णो॒तु॒ । दि॒वि । सन् । शु॒क्र: । आऽत॑त: । सुर॑: । न । हि । द्यु॒ता । त्वम् । कृपा । पा॒व॒क॒ । रोच॑से ॥४.५९॥

Mantra without Swara
त्वेषस्ते धूमऊर्णोतु दिवि षं छुक्र आततः। सूरो न हि द्युता त्वं कृपा पावक रोचसे॥

त्वेष: । ते । धूम: । ऊर्णोतु । दिवि । सन् । शुक्र: । आऽतत: । सुर: । न । हि । द्युता । त्वम् । कृपा । पावक । रोचसे ॥४.५९॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. हे प्रभो! (ते त्वेष:) = आपकी (दौप्ति धूम:) = हमारे अन्दर घुस आनेवाले वासनारूप शत्रुओं को कम्पित करनेवाली है [धू कम्पने]। यह (ऊर्णोतु) = हमें आच्छादित करनेवाली हो। सब शत्रुओं के आक्रमण से बचानेवाली हो। (दिवि) = यह मस्तिष्करूप द्युलोक में (सन्) [सत्] = उत्तम हो हमें सात्त्विक वृत्तिवाला बनाए । (शुक्रः) = यह हमें गतिमय जीवनवाला बनाए तथा आतत: यह सब ओर विस्तारवाली हो-यह हमें विशाल हृदय बनाए । २. जिस समय प्रभु की उस ज्ञानदीप्ति से हम 'सन्, शुक्र व आतत' बन पाएँ उस समय हमें अपने इस उत्कर्ष का गर्व न हो जाए। इसके लिए हम प्रभु का इस रूप में स्मरण करें कि-(सूरः न) = हे प्रभो! आप सूर्य के समान हो और हे पावक-हमारे जीवनों को पवित्र करनेवाले प्रभो! (त्वम्) = आप (हि) = निश्चिय से (द्युता) = ज्ञानज्योति से तथा कृपा-सामर्थ्य से (रोचसे) = चमकते हो। सब ज्योति व शक्ति आपकी हि है|
Essence
प्रभु की दीप्ति हमारी वासनाओं को कम्पित करके दूर करती हैं-यह हमें 'उत्तम गतिशील व विशाल हृदय' बनाती है। प्रभु ही हमारे अन्दर ज्योति व शक्ति से दीप्त होते हैं।
Subject
द्युता-कृपा