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Atharvaveda - Mantra 58

Atharvaveda 18/4/58

4 Sukta
89 Mantra
18/4/58
Devata- जगती Rishi- यम, मन्त्रोक्त Chhanda- अथर्वा Suktam- पितृमेध सूक्त
Mantra with Swara
वृषा॑ मती॒नांप॑वते विचक्ष॒णः सूरो॒ अह्नां॑ प्र॒तरी॑तो॒षसां॑ दि॒वः। प्रा॒णः सिन्धू॑नांक॒लशाँ॑ अचिक्रद॒दिन्द्र॑स्य॒ हार्दि॑मावि॒शन्म॑नी॒षया॑ ॥

वृषा॑ । म॒ती॒नाम् । प॒व॒ते॒ । वि॒ऽच॒क्ष॒ण: । सूर॑: । अह्ना॑म् । प्र॒ऽतरी॑ता । उ॒षसा॑म् । दि॒व: । प्रा॒ण: । सिन्धू॑नाम् । क॒लशा॑न् । अ॒चि॒क्र॒द॒त् । इन्द्र॑स्य । हार्दि॑म् । आ॒ऽवि॒शन् । म॒नी॒षया॑ ॥४.५८॥

Mantra without Swara
वृषा मतीनांपवते विचक्षणः सूरो अह्नां प्रतरीतोषसां दिवः। प्राणः सिन्धूनांकलशाँ अचिक्रददिन्द्रस्य हार्दिमाविशन्मनीषया ॥

वृषा । मतीनाम् । पवते । विऽचक्षण: । सूर: । अह्नाम् । प्रऽतरीता । उषसाम् । दिव: । प्राण: । सिन्धूनाम् । कलशान् । अचिक्रदत् । इन्द्रस्य । हार्दिम् । आऽविशन् । मनीषया ॥४.५८॥

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Meaning
१. (विचक्षण:) = वह सर्वद्रष्टा (सूरः) = सबको कर्मों में प्रेरित करनेवाल 'सूर्यसम दीस ज्योतिवाला' ब्रह्म हमारी (मतीनां वृषा) = बुद्धियों को शक्ति से सिक्त करनेवाला है। यह प्रभु (पवते) = बुद्धि देकर हमारे जीवनों को पवित्र करते हैं। ये प्रभु हमारे (अहाम्) = दिनों के (उषसाम्) = उषाकालों के (दिव:) = ज्ञान के प्रकाश के (प्रतरीता) = बढ़ानेवाले हैं। हमें दीर्घजीवन और प्रकाशमय जीवन प्राप्त कराते हैं। २. ये प्रभु हमारे जीवनों में (सिन्धूनाम्) = ज्ञानप्रवाहों के (प्राण:) = प्राण हैं। प्रभुकृपा से ही हमारे जीवनों में ये ज्ञानप्रवाह चलते हैं। (इन्द्रस्य) = एक जितेन्द्रिय पुरुष के (हार्दिम्) = हदय में (मनीषया) = बुद्धि के साथ (आविशन्) = प्रवेश करते हुए प्रभु (कलशान् अचिक्रदत्) = सोलह कलाओं के आधारभूत इन शरीरों को प्रभु के आह्वानवाला बनाते हैं। प्रभुकृपा से ही हममें प्रभु के आह्वान की प्रवृत्ति उत्पन्न होती है।
Essence
ये सर्वद्रष्टा प्रभु हमारी बुद्धियों को शक्ति से सिक्त करते हैं-हमें दीर्घ व प्रकाशमय जीवन प्राप्त कराते हैं। प्रभुकृपा से हमारे जीवन में ज्ञानप्रवाह चलते हैं और हम प्रभुकृपा से ही प्रभु-प्रवण वृत्तिवाले बनते हैं।
Subject
वृषा मतीनाम