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Atharvaveda - Mantra 57

Atharvaveda 18/4/57

4 Sukta
89 Mantra
18/4/57
Devata- अनुष्टुप् Rishi- यम, मन्त्रोक्त Chhanda- अथर्वा Suktam- पितृमेध सूक्त
Mantra with Swara
ये च॑ जी॒वा येच॑ मृ॒ता ये जा॒ता ये च॑ य॒ज्ञियाः॑। तेभ्यो॑ घृ॒तस्य॑ कु॒ल्यैतु॒ मधु॑धाराव्युन्द॒ती ॥

ये । च॒ । जी॒वा: । ये । च॒ । मृ॒ता: । ये । जा॒ता: । ये । च॒ । य॒ज्ञिया॑: । तेभ्य॑: । घृ॒तस्य॑ । कु॒ल्या॑ । ए॒तु॒ । मधु॑ऽधारा । वि॒ऽउ॒द॒न्ती ॥४.५७॥

Mantra without Swara
ये च जीवा येच मृता ये जाता ये च यज्ञियाः। तेभ्यो घृतस्य कुल्यैतु मधुधाराव्युन्दती ॥

ये । च । जीवा: । ये । च । मृता: । ये । जाता: । ये । च । यज्ञिया: । तेभ्य: । घृतस्य । कुल्या । एतु । मधुऽधारा । विऽउदन्ती ॥४.५७॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (ये च) = और जो (जीवा:) = जीवनशक्ति से परिपूर्ण पितर हैं, (ये च मृता:) = जिनमें वासना का अंश पूर्णरूप से मृत हो गया है [मृतं वासनाविनाश: एष अस्ति इति], (ये जाता:) = जिन्होंने अपने में शक्तियों का प्रादुर्भाव किया है, (ये च यज्ञिया:) = और जो यज्ञशील हैं, (तेभ्य:) = उन पितरों से (पतस्य) = ज्ञानजल की [घृ दीसौ] (कुल्या) = सरित्-नदी एतु हमें प्राप्त हो। इन पितरों से ज्ञान प्राप्त करते हुए हम भी 'जीवनशक्ति से परिपूर्ण, विनष्ट वासनाओंवाले, विकसित शक्तियोंवाले व यज्ञिय' बनें। २. वह घृतकुल्या हमारे लिए (मधुधारा) = मधु की धारा बने-हमारे जीवनों में माधुर्य को धारण करनेवाली हो तथा (व्युन्दती:) = हमारे हृदयों को भक्तिरस से क्लिन्न करनेवाली हो। ज्ञान हमें मधुर व प्रभुभक्त बनाए।
Essence
पितरों से ज्ञान प्राप्त करके हम मधुरवाणीवाले व भक्तिरस से क्लिन्न हृदयोंवाले बनें।
Subject
"जीव-मृत-जात-यज्ञिय' पितर